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भगवती सूत्र - श. ७ उ. १ दुःख से व्याप्त
१६ उत्तर - गोयमा ! दुक्खी दुक्खेणं फुडे, णो अदुक्खी दुक्खेणं
फुडे ।
१७ प्रश्न - दुक्खीणं भंते! णेरइए दुक्खेणं फुडे, अदुक्खी dese दुक्खेणं फुडे ?
१७ उत्तर - गोयमा ! दुक्खी रइए दुक्खेणं फुडे, णो अदुक्खी रए दुक्खेणं फुडे । एवं दंडओ, जाव वेमाणियाणं । एवं पंच दंडगा यव्वा - १ दुक्खी दुक्खेणं फुडे, २ दुक्खी दुक्खं परियायह ३. दुक्खी दुक्ख उदीरेइ, ४ दुक्खी दुक्ख वेएइ, ५ दुक्खी दुक्ख णिज्जरेइ |
कठिन शब्दार्थ--फुडे--स्पृष्ट, परियाय-- ग्रहण करता है ।
भावार्थ - १६ प्रश्न - हे भगवन् ! क्या दुखी जीव, दुःख से व्याप्त होता है, या अदुखी ( दुःख रहित ) जीव, दुःख से व्याप्त होता है ?
१६ उत्तर-हे गौतम ! दुखी जीव हो दुःख से व्याप्त होता है, अदुखी जीव, दुःख से व्याप्त नहीं होता ।
१७ प्रश्न - हे भगवन् ! क्या दुखी नैरयिक, दुःख से व्याप्त होता है, या अदुखी नैरयिक दुःख से व्याप्त होता है ?
दण्डक
१७ उत्तर - हे गौतम ! दुखी नैरयिक, दुःख से व्याप्त होता है, अदुखी नैरयिक, दुःख से व्याप्त नहीं होता। इस तरह वैमानिक पर्यन्त चौबीस ही में कहना चाहिए । इस तरह पांच दण्डक ( अलापक) कहने चाहिए । यथा - १ दुःखी, दुःख से व्याप्त होता है, २ दुःखी, दुःख को ग्रहण करता है, ३ दुःखी दुःख को उदीरता है ( उदीरणा करता है), ४ दुःखी दुःख को वेदता और ५ दुःखी दुःख को निर्जरता है ।
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