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भगवती सूत्र-श. ७ उ. १ ऐपिथिकी और साम्परायिकी क्रिया
को रखने से लोक-संस्थान बनता है।
लोक का विस्तार मूल में सात रज्जु परिमाण है। ऊपर क्रम से घटते हुए.सात रज्जु की ऊँचाई पर एक रज्जु विस्तार है। फिर क्रम से बढ़ते हुए साढ़े नौ से साढ़े दस रज्जु की उंचाई पर विस्तार पांच रज्जु है। फिर कम से घटते हुए मूल से चौदह रज्जु की ऊँचाई पर एक रज्जु का विस्तार है। मूल से लेकर ऊपर तक की ऊँचाई चौदह रज्जु है ।
___ लोक के तीन भेद हैं । उनमें से अधोलोक का आकार (उलटे) शराव जैसा है। तिर्यक् लोक का आकार झालर या पूर्ण चन्द्रमा जैसा है । ऊध्र्वलोक का आकार ऊर्ध्व मृदंग जैसा है।
___ इस लोक में उत्पन्न-ज्ञान-दर्शन-धारक अरिहन्त जिन केवली भगवान् सिद्ध होते है यावत् सभी दुःखों का अन्त करते हैं ।
ऐपिथिकी और साम्परायिकी क्रिया
५ प्रश्न-समणोवासयस्स णं भंते ! सामाइयकडस्स समणोवस्सए अच्छमाणस्स तस्स णं भंते ! किं इरियावहिया किरिया कजइ, संपराइया किरिया कन्जइ ?
५ उत्तर-गोयमा ! नो इरियावहिया किरिया कन्जइ, संपराइया किरिया कजइ।
प्रश्न-से केणटेणं जाव संपराइया ?
उत्तर-गोयमा ! समणोवासयस्स णं सामाइयकडस्स समणोवस्सए अच्छमाणस्स आया अहिगरणी भवइ, आयाऽहिगरणवत्तियं य णं तस्स णो इरियावहिया किरिया कजइ, संपराइया किरिया कजइ; से तेणटेणं जाव संपराइया।
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