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________________ प्रस्तावना ई० ५ वीं सदी है । अकलङ्कदेवने सर्वार्थसिद्धिकी पंक्तियोंको वार्तिक बनाकर तत्त्वार्थवार्तिककी रचना की है, तत्त्वार्थवार्तिकमें प्रायः जैनेन्द्र व्याकरणके ही सूत्रों के उद्धरण दिये हैं, सिद्धिविनिश्चय वृत्ति में शब्दानुशासनदक्ष पूज्यपादका उल्लेख किया है, तथा सिद्धिविनिश्चय के 'असिद्धः सिद्धसेनस्य' श्लोकमें 'विरुद्धो देवन्दिनः' लिखकर देवनन्दिका उल्लेख किया है। तात्पर्य यह कि अकलङ्कदेवको पूज्यपादके ग्रन्थ आधारभूत रहे हैं । अकलङ्कदेवने पूज्यपादके प्रति अपनी विनयवृत्ति पूरी तरह प्रकट की है । मल्लवादी और अकलङ्क ___ श्री मुनि जम्बूविजयजीने आचार्य मल्लवादीके नयचक्रका सिंहसूरि गणि क्षमाश्रमणकी वृत्तिसे उद्धार करके संपादन किया है । मल्लवादीके मूल नयचक्रमें भर्तृहरि और दिग्नागके मत आये हैं, अतः इनका समय ई० ५ वींके पूर्व नहीं है । इन्होंने सिंद्धसेनके उद्धरण दिये हैं इसलिये भी इस समयका समर्थन होता है । अकलङ्कदेवने न्यायविनिश्चय और प्रमाणसंग्रह में नयोंका विशेष विवरण जिस नयचक्रसे देखनेकी प्रेरणा की है वह यही नयचक्र मालूम होता है। आ० देवसेन (ई० ९३३)का एक नयचक्र प्रकाशित हुआ है किन्तु अकलङ्क और विद्यानन्द द्वारा उल्लिखित यह नयचक्र नहीं है। नयचक्र पर सिंहसूरिगणि क्षमाश्रमणकी वृत्ति है । इसमे 'विद्वन्मन्य अद्यतन बौद्ध' विशेषणसे अपोहसमर्थक दिग्नागका. उल्लेख मानकर इन्हें दिग्नागका समकालीन कहा जाता हैं। इनके ग्रन्थोंमें धर्मकीर्ति तथा उनके शिष्य परिवारके किसी ग्रन्थका उल्लेख नहीं है, अतः ये ई० ७ वींके पहिले और दिग्नाग (५ वीं) के बादके विद्वान् हो सकते हैं। अकलङ्कदेवके तत्त्वार्थवार्तिक (१।३३)में "सूत्रपातवद्जु सूत्रः" वाक्य 'नयचक्रसे आया है। जिनभद्र गणि क्षमाश्रमण और अकलङ्क ___ आचार्य जिनभद्र क्षमाश्रमणके विशेषावश्यक भाष्य आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं । इनके समयकी उत्तरावधि ई० ६०९ है । मुनि श्री जिनविजयजीने जैसलमेर भंडारसे प्राप्त विशेषावश्यक भाष्यकी प्रतिके अन्तमें पाई जानेवाली प्रशस्तिकी इन गाथाओंके आधारसे उनका काल ई० ६०९ ही निर्धारित किया है । "पंचसता इगतीसा सगणिवकालस्स वट्टमाणस्स । तो चेत्त पुण्णिमाए बुधदिण सातिम्मि णक्खत्ते॥ रज्जे णु पालणपरे सी [लाइ चम्मि परवरिन्दम्मि । वलभीणगरीए इमं महवि....."मि जिणभवणे ॥" प्रो० दलसुख मालवाणिया इसे प्रति लेखनका काल इसलिये मानते हैं कि उक्त गाथाओंमें ग्रन्थ समाप्तिका सूचक शब्द नहीं है और वे ई० ५९३ इनकी उत्तरावधि लिखते हैं । अस्तु, ये ई० ६ वींके अन्तभाग और अन्ततः ई० ६०९ तकके विद्वान् हैं। इन्होंने अपने विशेषावश्यक भाष्यमें प्रत्यक्षके मुख्य और सांव्यवहारिक दो भेद करके इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न ज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है। अकलङ्कदेवने भी प्रमाणसंख्या व्यवस्था करते समय प्रत्यक्षके ये ही दो भेद किये हैं। इस तरह अकलङ्क (१) सिद्धिवि० पृ० ६५३ । (२) सिद्धिवि० ६।२१। (३) "इष्टं तत्त्वमपेक्षातो नयानां नयचक्रतः ।" न्यायवि० ३।४७७। (१) "तद्विशेषाः प्रपञ्चेन संचिन्त्या नयचक्रतः ।"-प्रमाणसं० पृ० १२५ । (५) प्रो० दलसुखभाई- 'आचार्य मल्लवादीका नयचक्र' लेख, विजयेन्द्रसूरि स्मारकप्रन्थ । (६) नयच० वृ० लि. पृ० ३४५ ख०। (७) देखो गणधरवाद प्रस्ता० पृ. ३२ । (6) "इंदियमणोभवं जं तं संववहारपञ्चक्खं ।"-विशेषा० गा० ९५ । (९) "प्रत्यक्षं विशदं ज्ञानं मुख्यसंव्यवहारतः ।"-लघी० श्लो० ३ । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004038
Book TitleSiddhi Vinischay Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnantviryacharya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1944
Total Pages686
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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