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________________ नैष्ठिकाचार २३१ नाम स्मरण रूप सामायिक से गार्हस्थिक दैनिक पापों का नाश होता है, यह बतलाते हैं (अनुष्टुप्) संरम्भादिकभेदाद्वा कायकृतादिभेदतः । क्रोधादिसंयुता जीवा पापञ्चाष्टोत्तरं शतम् ।।१८५।। प्रतिदिनं प्रकुर्वन्ति दुःखदं तत्त्वतस्सदा । तन्नाशाय जपं कुर्याद् भक्त्या ह्यष्टोत्तरं शतम् ।।१८६।।युग्मम् ।। संरम्भेत्यादि:- कार्यकरणस्य विचारः संरम्भः। तत्साधनानामेकत्रीकरणं समारम्भः। तत्कार्यस्य प्रारम्भ एव आरम्भः। एतान् योगत्रयेण मनुष्यः यदि स्वयं करोति तदा तत्कृतमिति कथ्यते। अन्येन कारयति तदा कारितमिति। अन्यैस्तु क्रियमाणेषु कार्येषु तत्प्रशंसनं अनुमोदना। इत्यनेन प्रकारेण संरम्भादित्रयं त्रियोगेन करोति कारयति अनुमोदते च इति सप्तविंशतिप्रकाराणि पापानि कषायचतुष्काधारेण करोति चेत् अष्टोत्तरसंख्यकानि पापानि भवन्ति गृहाश्रमे प्रतिदिनमिति। तत्प्रक्षालनाय प्रतिदिनं परमात्मनः तन्नामानि अष्टोत्तरशतान्येव जाप्यानि। जपमालायां अष्टोत्तशतगोलकानां संख्या भवत्यत एव। १८५/१८६। गृहाश्रम में प्रतिदिन जो पुण्य या पाप के कार्य होते हैं उनका विभाजन १०८ प्रकार का किया गया है। उन १०८ प्रकार के पापों के प्रक्षालन हेतु १०८ बार परमात्मा का नाम स्मरण करना आवश्यक है। १०८ पाप कौन से हैं उनका विवरण किस भाँति हैं, आगे यह बतलाते हैं सर्वप्रथम मनुष्य उद्देश्य बाँधता है, कार्य करने का संकल्प करता है। इस उद्देश्य बंधन या संकल्प करण को संरम्भ कहते हैं। संकल्प के बाद उसे पूरा करने के लिए उस कार्य के पूर्ण करने योग्य साधनों को एकत्रित करने को सामारम्भ कहते हैं। साधनों के संगृहीत हो जाने पर उस कार्य का प्रारम्भ हो जाता है उसे शास्त्रकार आरम्भ कहते हैं। इस तरह इन तीनों को यह प्राणी मन, वचन व काय की सहायता से करता है, दूसरों से कराता है अथवा करनेवाले व्यक्ति के कार्य की अनुमोदना करता है। इस प्रकार ३ ३ ३ २७ प्रकार के इन पापों को क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायों के वश करता है। इस कारण पापों के भेद २७ ४ १०८ हो जाते हैं। जितनी संख्या में गृहाश्रम में ये पाप संभव हैं उतने दाने ही एक जपमाला में नियत किए गए हैं। यद्यपि जैनेतर बंधु भी १०८ दाने की माला जपते हैं, पर माला में १०८ दानों के रहने का Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004002
Book TitleShravak Dharm Pradip
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaganmohanlal Shastri
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year1997
Total Pages352
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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