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________________ श्रावकधर्मप्रदीप है और अपने को अभयरूप अनुभव कर सकता है। दार्शनिक श्रावक यह अनुभव करता है कि मेरे लिए इस संसाररूपी महान् समुद्र से उद्धार करनेवाले वे आकाशचारी समुद्र के तल से दूर रहनेवाले महान् उपकारक पञ्चपरमेष्ठी भगवान् ही हैं, वे ही एकमात्र शरण हैं, अन्य शरण नहीं। उनका आश्रय लेने से मैं अनायास ही इस दुःखमय बन्धन से शीघ्र मुक्त हो सकता हूँ। १५८ जैसे नाना विपत्तियों से घिरे हुए मनुष्य के जो अपनी दरिद्रता, रोग, बेकारी के तथा छोटे-छोटे बच्चों की रक्षा के भार के कारण परेशान है और मित्र, कुटुम्बी, साथी, समाज आदि सबके द्वारा परित्यक्त है, पास कोई भी नहीं आता, मोखिक सान्त्वना तक भी नहीं देता, बल्कि लोग तानाकसी करते हैं, व्यंग्य कसते हैं, चिढ़ाते हैं, नाना नई विपत्तियाँ लाकर खड़ी कर देते हैं। ऐसे समय यदि कोई सहानुभूतिपूर्ण वाक्य कहकर उसे उसकी गलती सुझावे तो वह उसे अमृतोपम मानकर नवजीवन-सा पाता है, और किसी भी हालत में उसकी बात टालने को तैयार नहीं है। उसे विश्वास है कि मेरे उद्धार का मार्ग यही व्यक्ति बतावेगा । डूबते हुए को तृण का सहारा भी बहुत हो जाता है। वह जानता है कि तृण बहता आ रहा है तो यहाँ पास में घास-फूसवाली जमीन भी होगी। इसी तरह वह विपद्ग्रस्त पुरुष भी यह आशा करता है कि जिसने मुझपर दया-दृष्टि कर सहानुभूति के दो शब्द कहे हैं और मेरी भूल बताई है, वह उस भूल का प्रतीकार भी बता सकता है। ऐसा विश्वास कर वह उसकी शरण पकड़ लेता है। ऐसे ही नाना व्यसनों में भरे हुए अनन्यशरण इस संसार में अपने स्वरूप का भान न होने से जो उस विपद्ग्रस्त पुरुष की तरह अपने को एकाकी और असहाय अनुभव करने लगा है वह अपनी भूल बतानेवाले दयामय पञ्चपरमेष्ठी भगवान् को ही एकमात्र अपना त्राता मानता है। वह जानता है, जो अन्य सब संसार के मोही व्यक्ति उसे अपने साथ ले डूबेंगे, ये ही वीतराग उद्धारक हैं जो मोह के फंदे से छूट चुके हैं। दार्शनिक प्रत्येक क्षण में सत्यमार्ग पर ही चलता है। वह सत्यान्वेषी है। वह प्रत्येकपदार्थ में उसके रहस्य का खोजी है। वह उसके ऊपरी मनोमोहक रूप से प्रभावित नहीं होता, किन्तु उसके आन्तरिक रहस्य को जानने में सदा प्रयत्नशील रहता है। यदि कोई उसे दुर्वचन कहे या उसकी हानि करे, तो वह बदले में दुर्वचन नहीं कहता और न विपक्षी को हानि पहुँचाने का प्रयत्न करता है। वह यह सोचेगा कि इसकी उत्तेजना का कारण क्या है? दुर्वचन किसी का स्वभाव तो होता नहीं है, फिर उसने मेरे प्रति ऐसा Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004002
Book TitleShravak Dharm Pradip
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaganmohanlal Shastri
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year1997
Total Pages352
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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