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________________ सागरसे प्रस्थान 397 मानना चाहिये। नीतिका वाक्य भी है कि 'तन्मिंत्र यन्निवतयति पापत्' अर्थात् मित्र वही है जो पापसे निवृत्त करे। विचार कर देखा जावे तो लोभ ही पापका पिता है। उससे जिसने मुक्ति दिलाई उससे उत्तम हितैषी संसार में अन्य कौन हो सकता है ? परन्तु यहाँ तो लोभको गुरु मानकर हम लोग उसका आदर करते हैं। जो लोभ-त्याग का उपदेश देता है, उससे बोलना भी पाप समझते हैं, तथा उसका अनादर करनेमें भी संकोच नहीं करते। जी हाँ, यह संसार है। इसमें नाना प्रकार के जीवोंका निवास है। कषायोदयमें नाना प्रकार की चेष्टाएँ होती हैं। जिन महानुभावोंके उन कषायोंका अभाव हो जाता है वे संसार समुद्रसे पार हो जाते हैं। हम तो कषायोंके सदभावसे यही ऊहापोह करते रहते हैं और यही करते करते एक दिन सभीकी आयुका अवसान हो जाता है। अनन्तर जिस पर्यायमें जाते हैं उसीके अनुकूल परिणाम हो जाते हैं। 'गंगामें गंगादास और जमुनामें जमुनादास' की कहावत चरितार्थ करते हए अनन्त संसार की यातनाओंके पात्र होकर परिभ्रमण करते रहते हैं। इसी परिभ्रमणका मूल कारण हमारी ही अज्ञानता है। हम निमित्तकारणको संसार-चिरभ्रमणका कारण मानकर साँपकी लकीर पीटते हैं, अतः जिन जीवोंका स्वात्महित करना इष्ट हैं उन्हें आत्मनिहित अज्ञानताको पृथक् करनेका सर्व प्रथम प्रयास करना चाहिये। उन्हें यही श्रेयोमार्गकी प्राप्तिका उपाय है। क्षमावाणीके दिन विद्यालयके प्रांगणमें श्रीजिनेन्द्रदेवके कलशाभिषेक का आयोजन हुआ। स्थानीय समाजकी उपस्थिति अच्छी थी। महिलाश्रमके लिये कुछ लोगोंने दान देना स्वीकृत किया। उसके बाद आश्विन वदी चौथको मेरी जयन्तीका उत्सव लोगोंने किया। उसी दिन श्री क्षुल्लक क्षेमसागरजी और श्री क्षुल्लक पूर्णचन्द्रजीके केशलोंच हुए। दोनों ही महाशयोंने घासकी तरह अपने केश उखाड़ कर फेंक दिये। देखकर लोगों के हृदय गद्गद हो गये। अनन्तर श्री सेठ भगवानदासजी बीड़ीवालोंकी अध्यक्षतामें सभा हुई जिसमें अनेक विद्वानोंके भाषण हुए। इसी समय सिंधैन फूलाबाईने एक हजार रुपया विद्यालयको और एक हजार रुपया महिलाश्रमको दिये। यह स्वर्गीय सिंघई शिवप्रसादजीकी विधवा पुत्रवधू हैं। इसने अपनी प्रायः सारी सम्पत्ति तथा मकान महिलाश्रमको पहले ही दान कर दिया था। धर्मसाधन करती हुई जीवन व्यतीत करती है। सिंघई रेवारामजीने भी महिलाश्रमको पाँच हजार रुपया देना स्वीकृत किया। इसके पहले आप अपनी सम्पत्तिका बहुभाग महिलाश्रमको Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004000
Book TitleMeri Jivan Gatha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGaneshprasad Varni
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year2006
Total Pages460
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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