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________________ को अतिआसान बना दिया है। वास्तव में जेट के समान तीव्र गति से दौड़ते हुए इस विश्व की भौतिक उन्नति में संचार-क्रान्ति का अहम योगदान रहा है। यह मानना गलत होगा कि सिर्फ आधुनिक युग में ही संप्रेषण के महत्त्व को स्वीकारा गया है, क्योंकि प्राचीन जैनआचारशास्त्रों में भी संप्रेषण-संयम या संप्रेषण-विवेक पर अत्यधिक जोर दिया गया है। न केवल आध्यात्मिक जीवन, अपितु व्यावहारिक जीवन में भी इनमें निर्दिष्ट सिद्धान्तों को प्रयोग करना एक अनिवार्य कर्त्तव्य है। सम्प्रेषण-संयम हेतु जैनशास्त्रों, जैसे - आचारांग, सूत्रकृतांग, प्रश्न-व्याकरण, प्रज्ञापना, दशवैकालिक , उत्तराध्ययन आदि में पर्याप्त निर्देश हैं। =====4.>===== जीवन-प्रबन्धन के तत्त्व 310 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003975
Book TitleJain Achar Mimansa me Jivan Prabandhan ke Tattva
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManishsagar
PublisherPrachya Vidyapith Shajapur
Publication Year2013
Total Pages900
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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