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________________ नहीं जगती, तब तक जैसे परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में आकर भी तुम्हारे द्वार से खाली हाथ लौट गया था, वैसे ही तुम भी परमात्मा के द्वार से खाली हाथ लौट आओगे । वास्तव में, वह व्यक्ति धन्य है, जो प्रभु से उसकी प्रभुता की प्रार्थना करता है। वह ध्रुव है, जो विश्वविभु से उसकी ध्रुवता मांगता है। शाश्वतता वहीं आती है, शंकरत्व वहीं उभरता है, जब व्यक्ति परमात्मा से परमात्मा को ही मांगता है। भगवान से होने वाला प्रेम वास्तव में उसकी भगवत्ता से होना चाहिए । इसलिए जितना प्रेम पत्नी के प्रति है, उतना ही प्रेम परमात्मा के प्रति भी होना चाहिए, बल्कि उससे भी ज्यादा। ज्यादा न कर सको, न सही, पर उतना तो करो, जितना पत्नी से प्रेम करते हो । पत्नी एक दिन को मायके चली जाती है, तो सोना और जीना हराम हो जाता है लेकिन परमात्मा के लिए क्या कभी नींद हराम हुई ? जैसे आप पत्नी के विरह में आधी रात को जागकर उठ बैठते हैं, क्या कभी अपने प्रभु के विरह में भी जागे हो ? उसकी प्रतीक्षा में रात-रात भर खिड़की में बैठे हो ? उसकी इन्तजारी का चिराग जलाया है? परमात्मा को पाने के लिए गहरी अभीप्सा चाहिए। केवल इच्छा नहीं । अरविन्द ने जिसे अभीप्सा कहा है, ऐसी प्यास चाहिए, जिसके लिए तुम अपने आप को कुर्बान कर सको । मिटा सको । प्यासे को सिर्फ पानी चाहिए। एक चुल्लू पानी के लिए प्यासा आदमी अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकता है । ठीक इसी तरह परमात्मा के लिए अभीप्सा जगती है, प्यास जगती है, तो परमात्मा हमारे पास होता है। पानी कीमती है, पर उसकी कीमत के सारे मापदण्ड हमारी प्यास पर टिके हैं । महाकवि तुलसीदास के जीवन की एक चर्चित घटना है । एक बार वे अपनी प्रेमिका के घर गये और यह सोचकर कि प्रेमिका ने ऊपर चढ़ने के लिए रस्सी लटकाई होगी, सर्प को पकड़कर ऊपर चढ़ गये । पर वह रस्सी नहीं वह तो अजगर था। तब प्रेमिका ने उलाहना देते हुए कहा कि जितनी प्रीति तुम्हारी मेरे प्रति है, उतनी श्री राम के प्रति होती तो तुम कुछ और होते । और तब तुलसी के जीवन में क्रान्ति घटित हुई । प्रेमी सब कुछ सहन कर सकता है, पर पत्नी का उपालम्भ नहीं। वह झनझना उठे। बदल गया सब - मन, दृष्टिकोण, जीवन । राजुल ने रथनेमि से कहा था कि रथनेमि ! जो तुम मुझे देखकर विचलित, कामातुर, प्रेम पिपासु हुए हो अगर तुम उतने ही प्रेमपिपासु भगवान श्री नेमिनाथ के प्रति हो जाते तो रथनेमि तुम सार्थक हो जाते। शायद नेमिनाथ से पहले निर्वाण को उपलब्ध हो जाते । Jain Education International एक बार प्रभु हाथ थाम लो / २६ For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003965
Book TitleBina Nayan ki Bat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year1994
Total Pages90
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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