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________________ समाधि के चरण : एकान्त, मौन और ध्यान १७६ __ मैं आपको एक घटना सुनाता हूं । इस घटना से मेरे स्वयं के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया । एक सम्राट के मन में इच्छा पैदा हुई कि दुनिया में जितने भी धर्म हैं, उनके बारे में जानूं । सम्राट ठहरा । सारे धर्मों के ग्रन्थ पढ़ने का समय कहाँ से मिलता । सम्राट ने पंडितों, मौलवियों व अन्य धर्मों के प्रमुखों को बुलाया और उनसे कहा कि जो जिस धर्म के बारे में अध्ययन रखता हो, निष्णात हो, वह उस धर्म का सार मुझे एक-एक पंक्ति में लिखकर दे दे, ताकि मैं उन धर्मों के बारे में जान सकू । हर धर्म के पंडित व ज्ञानी ने अपने-अपने धर्म का सार लिखकर दे दिया, मगर सम्राट के मन में कोई भी बात नहीं उतरी । एक दिन सम्राट ने सुना कि गाँव के बाहर कोई ऐसा संन्यासी आया है जो एकांत में जीता है । वह किसी से कुछ बोलता नहीं है । परम ध्यान में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा है । वह किसी प्रकार का उपदेश नहीं देता । किसी से नहीं बोलता | सम्राट ने सोचा ऐसे संन्यासी के पास चला जाए । हो सकता है, वह कोई सूत्र दे दे । सम्राट उस संन्यासी के पास पहुँचा और कहा, फकीर ! मैं कोई गुर जानना चाहता हूँ ताकि सारे धर्मों का सार समझ सकू और जो मेरी जिन्दगी के लिए कामयाब सूत्र बन सके । आप मुझे ऐसा ही मंत्र दीजिए । __फकीर ने सम्राट की मनःस्थिति समझी और उसे कहा कि मेरे गुरु ने मरते समय मुझे एक ताबीज दिया था । यह ताबीज मेरी बाँह पर हमेशा बंधा रहता है । मेरे गुरु ने मुझे कहा था कि उस ताबीज में एक मंत्र है, जिस पर सारे धर्मों का सार एक पंक्ति में लिखा है । मेरे गुरु ने यह भी कहा था कि इस ताबीज को तभी खोलना जब तुम अपने आप को चारों तरफ से असहाय महसूस करो, सारे रास्ते बन्द हो जाएं । मेरे सामने अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई, इसलिए मैंने इस ताबीज को नहीं खोला है । मैं यह ताबीज तुम्हें देता हूं, मगर शर्त याद रखना । इस ताबीज को तब ही खोलना जब सारे रास्ते बन्द हो जाएं और तुम अपने आप को बेसहारा पाओ । हकीकत में जिस समय आदमी जीवन की आखिरी वेदना को समझता है तभी उसका वेद पैदा होता है । वेदों को केवल पढ़ने और उन्हें कण्ठस्थ करने Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003892
Book TitleChale Man ke Par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year1993
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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