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________________ मन्दिर हैं, पर माँ तो वह मन्दिर है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुदरती तौर पर प्रतिष्ठित हैं, जिसकी वाणी में सत्यम् है, जिसकी आँखों में शिवम् है और जिसके हाथों में सुन्दरम् है। ____ कहते हैं ब्रह्मा का कार्य सृजन करना है। हमारा सृजन माँ ने किया इसलिए माँ ब्रह्मा है। हमारा पालन-पोषण माँ करती है इसलिए माँ विष्णु है। अपनी छाती की अमृत बूंदें माँ ने हमारे ज़िगर में उतारी। माँ ही हमारा उद्धार करती है। माँ ही हमें संस्कार देती है और माँ ही हमें अपने पाँवों पर खड़ा करती है। इसलिए माँ महादेव है। तीन देवताओं की अगर एक साथ पूजा करनी है तो माँ को पूजिए। __जीवन में माँ का होना ही काफी है। माँ है तो जीवन में पूर्णता है। जिस दिन व्यक्ति के जीवन से उसकी माँ दूर हो जाती है उसी दिन से उसका जीवन अपूर्ण हो जाता है। पत्नी को अर्धांगिनी बनाकर व्यक्ति अपने जीवन को पूर्णता देने की कोशिश अवश्य करता है किन्तु माँ के बगैर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का दैवीय उपसंहार नहीं कर सकता। माँ है तो जीवन की कविता का अर्थ है, पर माँ ही अगर चली जाए तो जीवन की कविता के कोई मायने नहीं हैं। याद रखिए पत्नी आपकी पसन्द है पर माँ परमात्मा का अनुग्रह है। कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी पसन्द के चक्कर में परमात्मा के अनुग्रह को ठुकरा बैठे। जिसने अब तक माँ के प्रेम को न पहचाना, माँ के वात्सल्य और ममता को महसूस न किया वही व्यक्ति कहता है कि पृथ्वी सहनशीला है। जिसने माँ की वत्सलता को न समझा वही यह कहने की जुर्रत कर सकता है कि सागर अथाह है। जिसने माँ के हृदय को न जाना वही कहेगा कि आकाश अनन्त है। जिसने माँ की ममता को जान लिया, अनुभव कर लिया वह जानता है कि सागर की थाह फिर भी पाई जा सकती है, पर माँ की ममता तो सागर से भी ज़्यादा अथाह है। ___माँ के वात्सल्य और त्याग को समझेंगे तो ही समझ पाएंगे कि आकाश का अन्त फिर भी ढूंढा जा सकता है, पर माँ की सहृदयता का अन्त नहीं पाया जा सकता। जहाँ में जिसका अंत नहीं, उसे आसमां कहते है और संसार में जिसका अंत नहीं उसे माँ कहते है। माँ पृथ्वी की तरह सहनशीला है, उसकी 55 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003879
Book TitleGhar ko Kaise Swarg Banaye
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year2012
Total Pages146
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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