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________________ ३४ प्रतिक्रमणसूत्र. गान करे , तथा ( स्तोत्राणिगोत्राणि के.) स्तोत्र जे तेमने तथा गोत्र जे तीर्थंकरना वंश तेमने (पति के०) पठन करे , वली (मंत्रान् के०) मंत्र गर्जित एवा पागेने पठन करे , अने वली बीजा जनोयें पठन क रेला एवा मंत्रोने सांजले , ते नव्य जीवो, ( कट्याणजाजः के) कल्या णने नजनारा एवा थाय ने. (हि के०) निश्चें ॥१॥ हवे आ ठेकाणे आशीर्वाद कहे . शिवमस्तु सर्वजगतः, परदितनिरता नवंतु नूतगणाः॥ दोषाः प्रयांतु नाशं, सर्वत्र मुखीनवंतु लोकाः॥२॥ अर्थः-(सर्वजगतः के) समग्र जगत् जे तेनुं (शिवमस्तु के०) कल्या ण थार्ज, तथा (नूतगणाः के०) प्राणिसमूह जे बे, ते (परहितनिरताः के०)परहित करवामां प्रीतियुक्त (जवंतु के०) सावधान था,तथा (दोषाः के०) दोष जे आधि, व्याधि, फुःख धर्मनपणुं ते (नाशं के) विशेषे क रीने नाशने (प्रयांतु के०) पामो, तथा ( सर्वत्र के०) सर्वस्थानकने विषे ( लोकाः के ) समग्रलोको, (सुखीजवंतु के०) सुखी था ॥२॥ अहं तिबयरमाया, सिवा देवी तुम्ह नयरनिवासिनी॥ अ म्द सिवं तुम्द सिवं, असिवोवसमं सिवं नवतु ॥ स्वाहा ॥३॥ अर्थः-(अहं के०) हुँ, (तिबयरमाया के०) तीर्थंकर जे श्री नेमिनाथ तेमनी माता, जे (सिवादेवी के) शिवा देवी बुं, ते केवी ? तो के (तुह्म के०) तमारा ( नयर के०) नगरने विषे (निवासिनी के) निवास करनारी बुं, एटले सान्निध्यकारी बु. ए कारण माटें (अह्म के) अमाकं ( सिवं के०) कल्याण हो, अने ( तुह्म के०) नामोच्चारमात्र करी तमारं (सिवं के०)कल्याण हो.(थसिवोवसमं के) अशिवनो ने उपशम जेमां एवं(सिवं के)कल्याण (नवतु के) हो. स्वाहा ए पदनो अर्थ पूर्ववत् जाणवो॥३॥ उपसर्गाः दयं यांति, बिद्यते मिघ्नवल्लयः॥ मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥४॥ अर्थः-(जिनेश्वरे के) जिनेश्वर ते (पूज्यमाने के) पूज्ये उते (विप्न वलयः के) विघ्ननी वलियो जे , ते विद्युते के) बेदाय , अने (मनः Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003850
Book TitlePratikraman Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1906
Total Pages620
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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