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________________ अध्यात्म-कमल-मार्तण्ड व्यवहार और निश्चय मोक्षमार्गका कथनसम्यग्दृग्ज्ञानवृत्तं त्रितयमपि युतं मोक्षमागों। विभक्तासर्व स्वात्मानुभूतिर्भवति च तदिदं निश्चयात्तत्त्वदृष्टः । एतद्रुतं च ज्ञात्वा निरुपधि-समये स्वात्मतत्वे निलीय यो निर्भेदोऽस्ति भूयस्स नियतमचिरान्मोक्षमाप्नोति चात्मा॥६ __ अर्थ-व्यवहारनयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र इन तीनोंका ऐक्य मोक्षमार्ग है-कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है-और वास्तविक अर्थको विषय करनेवाले निश्चयनयसे सम्यग्दर्शनादित्रयस्वरूप जो स्वानुभूति है वह मोक्षमार्ग है। इस प्रकार व्यवहार और निश्चयरूप मोक्षमार्गकी द्विविधताको जानकर जो आत्मा उपधिरहित समयमें-विभावपरिणतिके अभावकालमें-स्वकीय आत्मतत्त्वमें लीन होकर अभेदभावरूप परिणत होता है-वह नियमसे शीघ्र ही मोक्षको प्राप्त करता है। सिम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' तत्त्वार्थसूत्र, १-१ सम्मत्तणाणजुत्तं चारित्तं राग-दोस-परिहीणं । मोक्खस्स हवदि मग्गो भव्वाणं लद्धबुद्धीणं ।।१०६॥ धम्मादीसद्दहणं सम्मत् णाणमंगपुव्वगदं । चिट्टा तवं हि चरिया ववहारो मोक्खमग्गो त्ति ॥१६०॥ -पंचास्तिकाये, श्रीकुन्दकुन्दाचार्यः *णिञ्चयणयेण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा । ण कुणदि किंचि वि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गो त्ति ॥१६१॥ -पंचास्तिकाये, श्रीकुन्दकुन्दाचार्यः 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसमाहित अात्मैव जीवस्वभावनियतचरित्रत्वान्निश्चयेन मोक्षमार्गः ।' --पंचास्तिकायटीकायां, अमृतचन्द्राचार्यः Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003836
Book TitleAdhyatma Kamal Marttand
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages196
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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