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________________ केरणानुयोग-प्रवेशिका - ४३४. प्र०-संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत कौन-से भाव हैं ? उ०-चारित्र मोहनीय कर्मके उदयका क्षयोपशम होनेपर संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत भाव उत्पन्न होते हैं। इसलिये ये तीनों भाव क्षायोपशमिक हैं। ४३५. प्र०-अपूर्वकरण आदि चारों उपशम गुणस्थान कौन-से भाव हैं ? उ०-इनमें चारित्र मोहनीयकी इक्कीस प्रकृतियोंका उपशम होता है, इसलिये चारों गुणस्थान औपशमिक भावरूप हैं। ४३६. प्र०-चारों क्षपक, सयोगकेवली और अयोगकेवली कौन-से भाव हैं ? उ०-कर्मोंको क्षय करनेके कारण और कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न होनेके कारण चारों क्षपक वगैरह क्षायिक भावरूप हैं। ४३७. प्र०-कर्म किसको कहते हैं ? उ०-जो पुद्गल स्कन्ध जीवके राग, द्वेष आदि परिणामोंके निमित्तसे कर्मरूपसे परिणत होकर जीवके साथ बन्धको प्राप्त होता है उसको कर्म कहते हैं। ४३८. प्र.--कर्मके कितने भेद हैं ? उ०-आठ भेद हैं-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय । ४३९. प्र०-ज्ञानावरण कर्म किसको कहते हैं ? उ०--जो जीवके ज्ञान गुणको ढाँकता है उसको ज्ञानावरण कर्म कहते हैं। ४४०. प्र०--दर्शनावरण कर्म किसको कहते हैं ? उ०-जो जीवके दर्शन गुणको ढाँकता है उसको दर्शनावरण कर्म कहते हैं। ४४१. प्र०-वेदनीय कर्म किसको कहते हैं ? Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003835
Book TitleKarnanuyog Praveshika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKailashchandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1987
Total Pages132
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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