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________________ एगमेगा महानई छप्पन्नाए-छप्पन्नाए सलिलासहस्सेहिं समग्गा पुरत्थिमपच्चत्थिमेणं लवणसमुई समुप्पेइ-एवामेव सपुव्वावरेणं जंबुद्दीवे दीवे हरिवास-रम्मगवासेसु दो चउवीसा सलिलासयसहस्सा भवंतीतिमक्खायं जंबुद्दीवे णं भंते दीवे महाविदेहे वासे कइ महानईओ पन्नत्ताओ गोयमा दो महानईओ पन्नत्ताओ तं जहा- सीया य सीतोदा य तत्थ णं एगमेगा महानई पंचहि-पंचहिं सलिलासयसहस्सेहिं बत्तीसाए य सलिलासहस्सेहिं समग्गा पुरत्थिमपच्चत्थिमेणं लवणसमुदं समप्पेइ-एवामेव सपुव्वावरेणं जंबुद्दीवे दीवे महाविदेहे वासे दस सलिलासयसहस्सा चउसद्धिं च सलिलासहस्सा भवंतीतिमक्खायं जंबुद्दीवे णं भंते दीवे मंदरस्स पव्वयस्स दक्खिणेणं केवइया सलिलासयसहस्सा पुरत्थिमपच्चत्थिमाभिमुहा लवणसमुदं समप्पेंति गोयमा एगे छण्णए सलिलासय-सहस्से पुरत्थिमाभिमुहा लवणसमुदं समप्पेंति गोयमा छण्णउए सलिलासयसहस्से पुरत्थिमपच्चवक्खारो-६ एगे त्थिमाभिमुहे लवणसमुदं समप्पेइ जंबुद्दीवे णं भंते दीवे मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरेणं केवइया सलिलासयसहस्सा पुरत्थिमपच्चत्थिमाभिमहा लवणसमदं समप्पेंति गोयमा एगे छण्णए सलिलासयसहस्से पुरत्थिमपच्चत्थिमाभिमुहे लवणसमुदं समप्पेइं जंबुद्दीवे णं भंते दीवे केवइया सलिलासयसहस्सा पुरत्थिमाभमुहा लवणसमुदं समप्पेंति गोयमा सत्त सिललासयसहस्सा अट्ठवीसं च सहस्सा पुरत्थिमाभिमुहा लवणसमुदं समति जंबुद्दीवे णं भंते दीवे केवइया सलिलासयसहस्सा पच्चत्थिमाभिमुहा लवणसमुई समप्पेंति गोयमा सत्त सलिलासयसहस्सा अट्ठावीसं च सहस्सा पच्चत्थिमाभिमुहा लवणसमुदं समप्-तिएवामेव सपुव्वावरेणं जंबुद्दीवे दीवे चोद्दस सलिलासयसहस्सा छप्पण्णं च सहस्सा भवंतीतिमक्खायं | ० छट्टो वक्खारो समत्तो . • मुनि दीपरत्नसागरेण संशोधितः सम्पादित्तश्च छट्ठो वक्खारो समत्तो . । सत्तमो-वक्खारो । [२५०] जंबुद्दीवे णं भंते दीवे कइ चंदा पभासिंस पभासंति पभासिस्संति कइ सूरिया तवइंस तवेंति तविस्संति केवइया नक्खत्ता जोगं जोएस जोएंति जोएस्संति केवइया महग्गहा चारं चरिंसु चरंति चरिस्संति केवइयाओ तारागणकोडाकोडीओ सोभं सोभिंसु सोभंति सोभिस्संति गोयम दो चंदा पभासिंसु पभासंति पभासिस्संति दो सूरिया तवइंस् तवेंति तविस्संति छप्पन्नं नक्खत्ता जोगं जोइंस जोएंति जोएस्संति छावत्तरं महग्गहसयं चारं चरिंसु चरंति चरिस्संति । [२५१] एगं च सयसहस्सं तेत्तीसं खलु भवे सहस्साइं । नव य सया पन्नासा तारागणकोडिकोडिणं । [२५२] कइ णं भंते सूरमंडला० एगे चउरासीए मंडलसए पन्नत्ते जंबुद्दीवे णं भंते दीवे केवइयं ओगाहित्ता केवइया सूरमंडला. जंबुद्दीवे दीवे असीयं जोयणसयं ओगाहित्ता एत्थ णं पन्नट्ठी सूरमंडला पन्नत्ता, लवणे णं भंते समुद्दे केवइयं ओगाहित्ता केवइया सूरमंडला० लवणे णं समुद्दे तिण्णि तीसे जोयणसए ओगाहित्ता एत्थ णं एगूणवीसे सूरमंडलसए पन्नत्ते-एवामेव सपुव्वावरेणं जंबुद्दीवे दीवे लवणे य समुद्दे एगे चुलसीए सूरमंडलसए भवतीतिमक्खायं । दीपरत्नसागर संशोधितः] [99] [१८-जंबूद्दीवपन्नत्ति]
SR No.003735
Book TitleAgam 18 Jambudivpannatti Sattam Uvvangsuttam Mulam PDF File Without Correction
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDeepratnasagar
Publication Year2013
Total Pages122
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 18, & agam_jambudwipapragnapti
File Size2 MB
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