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________________ अणुओगदाराई कम्हा? अणुवओगो दव्वमिति द्रव्यम् इति कृत्वा । गुरु की वाचना से प्राप्त किया जाता है, वह कटद॥ आवश्यक-पद के अध्यापन, प्रश्न, परावर्तन और धर्म-कथा में प्रवृत्त होता है तब आगमतः द्रव्य आवश्यक है। वह अनुप्रेक्षा [अर्थ के अनुचिन्तन] में प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि द्रव्य निक्षेप अनुपयोग (चित्त की प्रवृत्ति से शून्य) होता है।" १४. नेगमस्स एगो अगवउत्तो नैगमस्य एकः अनुपयुक्तः १४. नैगमनय की अपेक्षा एक अनुपयुक्त (चित्त की आगमओ एगं दवावस्स यं, दोणि आगमतो एक द्रव्यावश्यकम्, द्वौ प्रवृत्ति से शून्य) व्यक्ति आगमतः एक द्रव्य अणुवउत्ता आगमओ दोण्णि अनुपयुक्तौ आगमतो द्वे द्रव्यावश्यके आवश्यक है, दो अनुपयुक्त व्यक्ति आगमतः दो दव्वावस्सयाई, तिणि अणुवउत्ता त्रय अनुपयुक्ताः आगमतो त्रीणि द्रव्य आवश्यक हैं, तीन अनुपयुक्त व्यक्ति आगमओ तिष्णि दव्वावस्सधाई, द्रव्यावश्यकानि, एवं यावन्तः आगमतः तीन द्रव्य आवश्यक हैं। एवं जावइया अणुवउत्तातावइयाइं अनुपयुक्ताः तावन्ति तानि नैगमस्य इस प्रकार जितने अनुपयुक्त व्यक्ति हैं, नगम ताई नेगमस्स आगमओ दव्वा- आगमतो द्रव्यावश्यकानि । एवमेव नय की अपेक्षा उतने ही आगमतः द्रव्य आवश्यक वस्सयाई। एवमेव ववहारस्स व्यवहारस्यापि। संग्रहस्य एको वा हैं। इसी प्रकार व्यवहारनय की अपेक्षा भी वि। संगहस्स एगो वा अणेगा वा अनेके वा अनुपयुक्तो वा अनुपयुक्ताः जितने अनुपयुक्त व्यक्ति हैं उतने ही आगमतः अणुवउत्तो वा अणुवउत्ता वा वा आगमतो द्रव्यावश्यक वा द्रव्या- द्रव्य-आवश्यक हैं। आगमओ दव्वावस्सयं वा दवाव- वश्यकानि वा, तदेकं द्रव्यावश्यकम् । संग्रहनय की अपेक्षा एक अनुपयुक्त व्यक्ति है स्सयाई वा, से एगे दवावस्सए। ऋजुसूत्रस्य एकः अनुपयुक्तः आगमतो अथवा अनेक अनुपयुक्त व्यक्ति हैं, आगमतः उज्जुसुयस्स एगो अणुवउत्तो एक द्रव्यावश्यक, पृथक्त्वं नेच्छति । एक द्रव्य आवश्यक है अथवा अनेक द्रव्य आगमओ एगं दवावस्सयं, पुहत्तं त्रयाणां शब्दनयानां ज्ञः अनुपयुक्तः आवश्यक हैं, वह एक द्रव्य आवश्यक है । नेच्छइ । तिण्हं सद्दनयाणं जाणए अवस्तु। कस्मात् ? यदि ज्ञः ऋजुसूत्रनय की अपेक्षा एक अनुपयुक्त व्यक्ति अणुवउत्ते अवत्थू । कम्हा? जइ अनुपयुक्तो न भवति। तदेतत् आगमत: एक द्रव्य-आवश्यक है। भिन्नता जाणए अणुवउत्ते न भवइ। से तं आगमतो द्रव्यावश्यकम् । उसे इष्ट नहीं है। आगमओ दवावस्सयं ।। तीनों शब्द नयों [शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत] की अपेक्षा अनुपयुक्त ज्ञाता अवस्तु [वास्तविक नहीं है। क्योंकि यदि कोई ज्ञाता है तो वह अनुपयुक्त नहीं होता। वह आगमतः द्रव्य आवश्यक है।" १५.से कि तं नोआगमओ दव्वावस्सयं? अथ कि तद् नोआगमतो द्रव्या- १५. वह नोआगमत: द्रव्य-आवश्यक क्या है ? नोआगमओ दव्वावस्सयं तिविहं वश्यकम् ? नोआगमतो द्रव्यावश्यक नो आगमत. द्रव्य आवश्यक के तीन प्रकार पण्णत्तं, तं जहा--जाणगसरीर- त्रिविधं प्रजप्तम्, तद्यथा--जशरीर- प्रज्ञप्त हैं, जैसे-ज्ञ-शरीर-द्रव्य-आवश्यक, दव्वावस्सयं भवियसरीरदव्वा- द्रव्यावश्यकं भव्यशरीरद्रव्यावश्यक भव्य-शरीर-द्रव्य-आवश्यक, ज्ञ-शरीर भव्यबस्सयं जाणगसरीर-भवियसरीर- ज्ञशरीर-भव्यशरीरव्यतिरिक्तं द्रव्या- शरीर-व्यतिरिक्त द्रव्य आवश्यक । वतिरित्तं दव्यावस्सयं ॥ वश्यकम्। १६.से कि तं जाणगसरीरदव्वा- अथ कि तत् ज्ञशरीर द्रव्या- १६. वह ज्ञ-शरीर-द्रव्य-आवश्यक क्या है? वस्सयं? जाणगसरीरदव्वा- वश्यकम् ? ज्ञशरीर द्रव्यावश्यकं - ज्ञ-शरीर-द्रव्य-आवश्यक - आवश्यक इस पद वस्सयं-आवस्सए त्ति पयत्याहि- आवश्यकम् इति पदार्थाधिकारजस्य के अर्थाधिकार को जानने वाले व्यक्ति का जो गारजाणगस्स जं सरीरयं ववगय- यत् शरीरकं व्यपगतच्युतच्यावित- शरीर अचेतन, प्राण से च्युत, किसी निमित्त चय-चाविय-चत्तदेहं जीवविप्पजढं त्यक्तदेहं जीवविहीणं शय्यागतं वा से प्राणच्युत किया हुआ, अनशन द्वारा त्यक्त सेज्जागयं वा संथारगयं वा संस्तारगतं वा निषिधिकागतं वा अथवा जीव-विप्रमुक्त है, उसे शय्या, बिछौने, Jain Education Intemational For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.003627
Book TitleAgam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1996
Total Pages470
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_anuyogdwar
File Size24 MB
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