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________________ प्राचीनाचार्य विरचित आराधनापताका में समाधिमरण की अवधारणा का समालोचनात्मक अध्ययन गए हैं। इंगिनीमरण का समावेश वहाँ भक्तप्रत्याख्यान में कर लिया गया है। बालमरण के बारह भेद किए गए हैं, जो मरण के विभिन्न निमित्तों के द्योतक हैं। वे इस प्रकार हैं 1. बलन्मरण 2. वशार्त्तमरण 3. निदानमरण 4. तद्भवमरण 5 गिरिपतनमरण 6 तरुपतनमरण 7. जलप्रवेशमरण 8 अग्निप्रवेशमरण 9. विषभक्षणमरण 10. शस्यावपाटमरण 11. वैहायसमरण तथा 12. गिद्धपट्ठमरण या गृद्धस्पष्टमरण । मरण के इन विभिन्न प्रकारों के गुण दोषानुसार वलयमरण, वशार्त्तमरण, निदानमरण, तद्भवमरण, गिरिपतनमरण, जलप्रवेशमरण, अग्निप्रवेशमरण, विषभक्षणमरण एवं शस्यावपाटनमरण को भगवान् महावीर द्वारा अवर्णित, अकीर्त्तित, अप्रशंसित एवं अनभ्यनुज्ञात कहा गया है। उपासकदशांग - सूत्र - सातवें अंग- आगम उपासकदशांगसूत्र के दस अध्ययनों में श्रमण भगवान् महावीर के शासन के दस उत्कृष्ट उपासकों (गृहस्थ - आराधकों) की उत्कृष्ट आध्यात्मिक-साधना का वर्णन मिलता है। उनमें, मृत्यु के समीप आने पर तथा वृद्धावस्था व रोग के कारण शरीर के धर्माराधना के लिए अनुपयुक्त हो जाने पर उनके द्वारा अपश्चिम मारणान्तिक-संलेखना की आराधना करने का और उसे भंग करने हेतु देवकृत उपसर्गों का वृत्तान्त मिलता है। इसमें इस आराधना के निम्न पांच अतिचारों का उल्लेख भी मिलता है - 1 1. इहलोगासंसाप्रयोग- उच्च और समृद्ध दैविक पुनर्जन्म की आकांक्षा करना । 2 परलोकासंसाप्रयोग - परलोक में उच्च और समृद्ध दैविक पुनर्जन्म की आकांक्षा करना । 3. जीवितासंसाप्रयोग- समाधिमरण की आराधना करते हुए मिल रहे मान-सम्मान को समझकर लम्बे समय तक जीने की आकांक्षा करना । 45 4. मरणासंसाप्रयोग - समाधिमरण की आराधना में बढ़ते हुए कष्टों से घबराकर जल्दी मरने की आकांक्षा करना । 5. कामभोगासंसाप्रयोग - समाधिमरण की आराधना से उपार्जित पुण्यफल के रूप में जन्म-जन्मान्तर में अनेक कामभोगों को प्राप्त करने की आकांक्षा करना । अन्तकृत्दशा— इस आगम में जन्म-मरण के दुःखों का अन्त कर देने वाले महापुरुषों के जीवन का वर्णन मिलता है । स्थानांगसूत्र में इस ग्रन्थ में दस अध्ययन होने का उल्लेख है, जबकि समवायांगसूत्र में दस अध्ययन एवं सात वर्गों का उल्लेख है । वर्त्तमान में प्रस्तुत आगम में एक श्रुतस्कन्ध तथा आठ वर्ग हैं, जिनमें क्रमशः दस, आठ, तेरह, दस, दस सोलह तेरह और दस अध्ययन हैं। छठवें, सातवें, आठवें वर्ग में महावीर के समकालीन उनचालीस उग्र तपस्वियों एवं साध्वियों के समाधिमरण का विवरण मिलता है। सातवें, आठवें वर्ग में सम्राट श्रेणिक की नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा आदि महारानियों के समाधिमरण लेने का विवरण मिलता है। अनुत्तरोपपातिक - सूत्र - इस सूत्र के तैंतीस अध्यायों में भी समाधिमरण की साधना का हृदयग्राही वर्णन उपलब्ध होता है। इसमें यह कहा गया है कि समाधिमरण की साधना से प्राप्त पुण्यफल से वे सब साधक जन्मान्तर में अनुत्तर - विमानों में पैदा हुए। 1 उपासकदशांग सूत्र, 91 2 'देखें - अन्तकृतदशांगसूत्र - सं. मुनि मिश्रीमलजी मधुकर, ब्यावर 3 'अनुत्तरोपपातिकसूत्र - सं. मुनि कन्हैयालाल, कमल आगम प्रकाशन समिति ब्यावर -, 1990 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003609
Book TitleAradhanapataka me Samadhimaran ki Avadharna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPratibhashreeji, Sagarmal Jain
PublisherPrachya Vidyapith Shajapur
Publication Year2010
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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