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________________ ठाणं (स्थान) स्थान २: सूत्र १४३-१५० १४३. दुविहा वणस्सइकाइया पण्णत्ता, द्विविधाः वनस्पतिकायिका: प्रज्ञप्ताः, १४३. वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैं तं जहा—गतिसमावण्णगा चेव, तद्यथा—गतिसमापन्नकाश्चैव, गतिसमापन्नक। अगतिसमावण्णगा चेव। अगतिसमापन्नकाश्चैव। अगतिसमापन्नक। दव्व-पदं १४४. दुविहा दव्वा पण्णत्ता, तं जहा गतिसमावण्णगाचेव, अगतिसमावण्णगा चेव । द्रव्य-पदम् द्रव्य-पद द्विविधानि द्रव्याणि प्रज्ञप्तानि, १४४. द्रव्य दो प्रकार के हैंतद्यथा—गतिसमापन्नकानि चैव, गतिसमापन्नक-गमन में प्रवृत्त। अगतिसमापन्नकानि चैव। अगतिसमापन्नक-अवस्थित। जीव-णिकाय-पदं जीव-निकाय-पदम् जीव-निकाय-पद १४५. दुविहा पुढविकाइया पण्णत्ता, तं द्विविधा: पृथिवीकायिकाः प्रज्ञप्ताः, १४५. पृथ्वीकायिक जीव दो प्रकार के हैंजहा—अणंतरोगाढा चेव, तद्यथा-अनन्तरावगाढाश्चैव, अनंतरावगाढ-वर्तमान समय में किसी परंपरोगाढा वेव। परम्परावगाढाश्चैव । आकाशदेश में स्थित। परम्परावगाढ-दो या अधिक समयों से किसी आकाशदेश में स्थित। १४६. 'दुविहा आउकाइया पण्णत्ता, तं द्विविधाः अप्कायिकाः प्रज्ञप्ताः, १४६. अप्कायिक जीव दो प्रकार के हैंजहा-अणंतरोगाढा चेव, तयथा-अनन्तरावगाढाश्चैव. अनंतरावगाढ। परंपरोगाढा चेव। परम्परावगाढाश्चैव। परम्परावगाढ। १४७. दुविहा तेउकाइया पण्णता, तं द्विविधाः तेजस्कायिकाः प्रज्ञप्ताः, १४७. तेजस्कायिक जीव दो प्रकार के हैंजहा-अणंतरोगाढा चेव। तदयथा-अनन्तरावगाढाश्चैव. अनंतरावगाढ। परंपरोगाढा चेव। परम्परावगाढाश्चैव। परम्परावगाढ । १४८. दुविहा वाउकाइया पण्णत्ता, तं द्विविधा: बायुकायिकाः प्रज्ञप्ताः, १४८. वायुकायिक जीव दो प्रकार के हैंजहा-अणंतरोगाढा चेव, तद्यथा--अनन्तरावगाढाश्चैव, अनंतरावगाढ । परंपरोगाढा चेव। परम्परावगाढाश्चैव। परम्परावगाढ। १४६. दुविहा वणस्सइकाइया पण्णत्ता, तं द्विविधाः वनस्पतिकायिकाः प्रज्ञप्ताः, १४६. वनस्पतिकायिक जीव दो प्रकार के हैंजहा अणंतरोगाढा चेव, तद्यथा-अनन्तरावगाढाश्चैव, अनंतरावगाढ। परंपरोगाढा चेव। परम्परावगाढाश्चैव। परम्परावगाढ़। दव्वं-पदं १५०. दुविहा दवा पण्णत्ता, तं जहा अणंतरोगाढा चेव, परंपरोगाढा चेव। द्रव्य-पदम् द्रव्य-पद द्विविधानि द्रव्याणि प्रज्ञप्तानि, १५०. द्रव्य दो प्रकार के हैंतद्यथा-अनन्तरावगाढानि चैव, अनंतरावगाढ। परम्परावगाढानि चैव। परम्परावगाढ। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003598
Book TitleAgam 03 Ang 03 Sthanang Sutra Thanam Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Nathmalmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1990
Total Pages1094
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sthanang
File Size23 MB
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