SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 367
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ठाणं (स्थान) ३२६ स्थान ४ : सूत्र १३३-१३६ १३३. चउविहे पायच्छित्ते पण्णते, तं चतुर्विधं प्रायश्चित्तं प्रज्ञप्तम्, तद्यथा-- १३३. प्रायश्चित्त चार प्रकार का होता हैजहाप्रतिसेवनाप्रायश्चित्तं, १. प्रतिषेवणा-प्रायश्चित्त-अकृत्य का पडिसेवणापायच्छित्ते, संयोजनाप्रायश्चित्तं, सेवन करने पर प्राप्त होने वाला प्रायसंजोयणापायच्छित्ते, आरोवणा- आरोपणाप्रायश्चित्तं, श्चित्त, २. संयोजना-प्रायश्चित्त-एक पायच्छित्ते, पलिउंचणापायच्छित्ते। परिकुञ्चनाप्रायश्चित्तम् । जातीय अनेक अतिचारों के लिए प्राप्त होने वाला प्रायश्चित्त, ३. आरोपणाप्रायश्चित्त-एक दोष का प्रायश्चित्त चल रहा हो, उस बीच में ही उस दोष को पुन -पुनः सेवन करने पर जो प्रायश्चित्त की अवधि बढ़ती है, ४. परिकुञ्चनाप्रायश्चित्त-अपराध को छिपाने का प्रायश्चित्त । काल-पदं काल-पदम् १३४. चउविहे काले पण्णत्ते, तं जहा- चतुर्विधः कालः प्रज्ञप्तः, तद्यथा- पमाणकाले, अहाउयनिव्वत्तिकाले, प्रमाणकालः, यथायुनिवृत्तिकाल:, मरणकाले, अद्धाकाले। मरणकालः, अद्ध्वाकालः । काल-पद १३४. काल चार प्रकार का होता है १. प्रमाणकाल-काल के दिवस, रात्रि आदि विभाग, २. यथायुःनिवृत्तिकालआयुष्य के अनुरूप नरक आदि गतियों में रहने का काल, ३. मरणकाल-मृत्यु का समय, ४. अद्धाकाल-सूर्य की गति से पहचाना जाने वाला काल । पोग्गल-परिणाम-पदं १३५. चविहे पोग्गलपरिणामे पण्णत्ते तं जहावण्णपरिणामे, गंधपरिणामे, रसपरिणामे, फासपरिणाम। पुद्गल-परिणाम-पदम् पुद्गल-परिणाम-पद चतुर्विधः पुद्गलपरिणामः प्रज्ञप्तः, १३५. पुद्गल का परिणाम चार प्रकार का होता तद्यथा है--१. वर्णपरिणाम-वर्ण का परिवर्तन, वर्णपरिणामः, गन्धपरिणामः, २. गंधपरिणाम-- गंध का परिवर्तन, रसपरिणाम:, स्पर्शपरिणामः । ३. रसपरिणाम-रस का परिवर्तन, ४. स्पर्शपरिणाम-स्पर्श का परिवर्तन । चाउज्जाम-पदं चातुर्याम-पदम् चातुर्याम-पद १३६. भरहेरवएसु णं वासेसु पुरिम- भरतैरावतयोः वर्षयोः पूर्व-पश्चिम- १३६. भरत और ऐरवत क्षेत्र में प्रथम और पच्छिमवज्जा मज्झिमगा बावीसं वर्जाः मध्यमका: द्वाविशंति: अर्हन्तः अन्तिम को छोड़कर शेष बाईस अहंन्त अरहता भगवंतो चाउज्जामं धम्मं भगवन्तः चातुर्यामं धर्म प्रज्ञापयन्ति, भगवान् चातुर्याम धर्म का उपदेश देते हैं, पण्णवयंति, तं जहातद्यथा वह इस प्रकार है Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003598
Book TitleAgam 03 Ang 03 Sthanang Sutra Thanam Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Nathmalmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1990
Total Pages1094
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sthanang
File Size23 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy