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________________ ठाणं (स्थान) २५८ स्थान ३ : सूत्र ५२७-५३४ खीणमोह-पदं क्षीणमोह-पदम् क्षीणमोह-पद ५२७ खीणमोहस्स णं अरहओ तओ क्षीणमोहस्य अर्हतः त्रीणि सत्त्कर्माणि ५२७. क्षीणमोह अर्हन्त के तीन कर्माश [कर्म कम्मंसा जुगवं खिज्जति, तं युगपत् क्षीयन्ते, तद्यथा-ज्ञानावरणीयं, प्रकृतियां] एक साथ क्षीण होते हैं-- जहा—णाणावरणिज्जं, दर्शनावरणीयं, आन्तरायिकम् । १. ज्ञानावरणीय, २. दर्शनावरणीय, दंसणावरणिज्ज, अंतराइयं । ३.अन्तराय। णक्खत्त-पदं नक्षत्र-पदम् नक्षत्र-पद ५२८. अभिईणक्खत्ते तितारे पण्णत्ते। अभिजिद् नक्षत्रं त्रितारकं प्रज्ञप्तम् । ५२८. अभिजित् नक्षत्र के तीन तारे हैं। ४२६. एवं—सवणे, अस्सिणी, भरणी, एवम्-श्रवणः, अश्विनी, भरणी, ५२६. इसी प्रकार श्रवण, अश्विनी, भरणी, मगसिरे, पूसे, जेट्ठा। मृगशिरः, पुष्यः, ज्येष्ठा। मृगसर, पुष्य तथा ज्येष्ठा नक्षत्र के भी तीन-तीन तारे हैं। तित्थकर-पदं तीर्थकर-पदम् तीर्थकर-पद ५३०. धम्माओ णं अरहाओ संती अरहा धर्माद् अर्हतः शान्तिः अर्हन् त्रिषु ५३०. अर्हत् शान्ति अर्हत् धर्म के पश्चात् तीन तिहिं सागरोवमेहि तिचउभाग- सागरोपमेषु त्रिचतुर्भागपल्योपमोनकेषु सागरोपम में से चौथाई भाग कम पलिओवमऊणएहि वोतिक्कतेहि व्यतिक्रान्तेषु समुत्पन्नः । पल्योपम के बीत जाने पर समुत्पत्ल हुए। समुप्पण्णे। ५३१. समणस्स णं भगवओ महावीरस्स श्रमणस्य भगवतः महावीरस्य यावत् ५३१. श्रमण भगवान् महावीर के बाद तीसरे जाव तच्चाओ पुरिसजुगाओ तृतीयं पुरुषयुगं युगान्तकरभूमिः। पुरुष युग जम्बू स्वामी तक युगान्तकरजुगंतकरभमी। भूमि-निर्वाण गमन का क्रम रहा है। ५३२. मल्ली णं अरहा तिहिं पुरिससएहिं मल्ली अर्हन् त्रिभिः पुरुषशतैः सार्धं ५३२. अर्हत् मल्ली तीन सौ पुरुषों के साथ सद्धि मुंडे भवित्ता 'अगाराओ मुण्डो भूत्वा अगाराद् अनगारितां मुण्डित होकर अगार धर्म से अनगार धर्म अणगारियं पव्वइए। प्रवजितः । में प्रवजित हुए। ५३३. पासे णं अरहा तिहिं पुरिससरहिं पार्श्वः अर्हन् त्रिभिः पुरुषशतैः सार्धं मुण्डो ५३३. इसी प्रकार अर्हत् पार्श्व तीन सौ पुरुषों के सद्धि मुंडे भवित्ता अगाराओ भूत्वा अगाराद् अनगारितां प्रव्रजितः । साथ मुण्डित होकर अगार धर्म से अनगार अणगारियं पव्वइए। धर्म में प्रवजित हुए। ५३४. समणस्स णं भगवतो महावीरस्स श्रमणस्य भगवतः महावीरस्य त्रीणि ५३४. श्रमण भगवान् महावीर के तीन सौ शिष्य तिण्णि सया चउद्दसपुव्वीणं अजि- शतानि चतुर्दशपुविणां अजिनानां जिन चौदह पूर्वधर थे, जिन नहीं होते हुए भी जिन के समान थे, सर्वाक्षर-सन्निपाती १० णाणं जिणसंकासाणं सव्वक्खर- संकाशानां सर्वाक्षरसन्निपातिनां जिना तथा जिन भगवान् की तरह अवितथ सण्णिवातीणं जिणा [जिणाणां?] [जिनानां ? ] इव अवितथं व्याकुर्वा व्याकरण करने वाले थे। यह भगवान् इव अवितहं वागरमाणाणं णानां उत्कर्षिका चतुर्दशपुविसंपदा महावीर के उत्कृष्ट चतुर्दश पूर्वी शिष्यों उक्कोसिया चउद्दसपुस्विसंपया अभवत् । की सम्पदा थी। हुत्था । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003598
Book TitleAgam 03 Ang 03 Sthanang Sutra Thanam Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Nathmalmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1990
Total Pages1094
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sthanang
File Size23 MB
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