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________________ स्थान २:३२५-३३० ठाणं (स्थान) दो पुप्फकेतू, दो भावकेऊ [चारं चरिसु वा चरंति वा चरिस्संति वा ?]। जंबुद्दीव-वेइआ-पदं जम्बूद्वीप-वेदिका-पदम् जम्बूद्वीप-वेदिका-पद ३२६. जंबुद्दीवस्स णं दीवस्स वेइआ दो जम्बूद्वीपस्य द्वीपस्य वेदिका द्वे गव्यूती ३२६. जम्बूद्वीप द्वीप की वेदिका दो कोस ऊंची गाउयाइं उड्ड । उच्चत्तेणं ऊर्ध्वं उच्चत्वेन प्रज्ञप्ता। पण्णत्ता। लवण-समुद्द-पदं लवण-समुद्र-पदम् लवण-समुद्र-पद ३२७. लवणे णं समुद्दे दो जोयणसय- लवणः समुद्रः द्वे योजनशतसहस्र ३२७. लवण समुद्र का चक्रवाल-विष्कंभ सहस्साइं चक्कवालविक्खंभेणं चक्रवालविष्कम्भेण प्रज्ञप्तः । (वलयाकार चौड़ाई) दो लाख योजन पण्णत्ते। का है। ३२८. लवणस्स णं समुद्दस्स वेइया दो लवणस्य समुद्रस्य वेदिका द्वे गव्यूती ३२८. लवण समुद्र की वेदिका दो कोस ऊंची गाउयाइं उड्ड उच्चत्तेणं ऊर्ध्व उच्चत्वेन प्रज्ञप्ता। पण्णत्ता। धायइसंड-पदं धातकीषण्ड-पदम् धातकीषण्ड-पद ३२६. धायइसंडे दीवे पुरथिमद्धे णं धातकीषण्डे द्वीपे पौरस्त्याधै मन्दरस्य ३२६. धातकीषंड द्वीप के पूर्वाद्ध में मन्दर पर्वत मंदरस्स पव्वयस्स उत्तर-दाहिणे पर्वतस्य उत्तर-दक्षिणे द्वे वर्षे प्रज्ञप्ते- के उत्तर-दक्षिण में दो क्षेत्र हैंणं दो वासा पण्णत्ता- बहुसमतुल्ये यावत्, तद्यथा भरत-दक्षिण में, ऐरवत---उत्तर में। बहुसमतुल्ला जाव, तं जहा- भरतं चैव, ऐरवतं चैव । वे दोनों क्षेत्र-प्रमाण की दृष्टि से सर्वथा भरहे चेव, एरवए चेव। सदृश हैं यावत् वे लम्बाई, चौड़ाई, संस्थान और परिधि में एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं करते। ३३०. एवं—जहा जंबुद्दीवे तहा एत्थवि एवम्—यथा जम्बूद्वीपे तथा अत्रापि ३३० इसी प्रकार जम्बूद्वीप द्वीप के प्रकरण में भाणियव्वं जाव दोसु वासेसु भणितव्यं यावत् द्वयोः वर्षयोः मनुजाः आये हुए सूत्र २।२६६-३२० तक का मणुया छब्विहंपि कालं पच्चणु- षड्विधमपि कालं प्रत्यनुभवन्तो वर्णन यहां वक्तव्य है। विशेष इतना ही शवमाणा विहरंति, तं जहा- विहरन्ति, तद्यथा है कि यहां वृक्ष दो हैं--कूट शाल्मली भरहे चेव, एरवए चेव। भरते चैव, ऐरवते चैव। और धातकी। देव दो हैं-कूट शाल्मली वरं—कूडसामली चेव, धायई- नवरं- कूटशाल्मली चैव, पर गरुडकुमार जाति का वेणुदेव और रुक्खे चेव । देवा-गरुले चेव धातकीरुक्षश्चैव। देवौ गरुडश्चैव धातकी पर सुदर्शन देव। वेणदेवे, सुदंसणे चेव। वेणुदेवः, सुदर्शनश्चैव। www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only Jain Education International
SR No.003598
Book TitleAgam 03 Ang 03 Sthanang Sutra Thanam Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Nathmalmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1990
Total Pages1094
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sthanang
File Size23 MB
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