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________________ भगवई २५६ श.२ः उ.५: सू.७६,८० हैं-स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद | पहल पहले अर्थ का संबंध मोहकर्म से है। संवेदना को भाववेद और अवयव को द्रव्यवेद कहा जाता है। वेद के तीन प्रकार ५०. से कहमेयं भंते ! एवं ? तत् कथमेतद् भदन्त ! एवम् ? ८०. 'भन्ते ! यह इस प्रकार कैसे है ? गोयमा ! जंणं ते अण्णउत्थिया एव- गौतम ! यत् ते अन्ययूथिकाः एचमाख्यान्ति गौतम ! अन्ययूथिक, जो ऐसा आख्यान करते हैं माइक्खंति जाव इत्थिवेदं च, पुरिसवेदं च । यावत् स्त्रीवेदं च पुरुषवेदं च । ये एते एव- यावत् जीव एक साथ स्त्रीवेद और पुरुषवेद दोनों जेते एवमाहंसु, मिच्छं ते एवमाहंसु । अहं माहुः, मिथ्या ते एवमाहुः । अहं पुनः गौतम! का वेदन करते हैं। जो ऐसा कहते हैं, वे मिथ्या पुण गोयमा ! एवमाइक्खामि भासामि एवमाख्यामि भाषे प्रज्ञापयामि प्ररू- कहते हैं। गौतम ! मैं इस प्रकार आख्यान, पण्णवेमि परूवेमिपयामि भाषण, प्रज्ञापन और प्ररूपण करता हूँ१. एवं खलु णियंठे कालगए समाणे १. एवं खलु निर्ग्रन्थः कालगतः सन् १. मृत्यु को प्राप्त हुआ निर्ग्रन्थ महान् ऋद्धि और अण्णयरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववत्तारो अन्यतरेषु देवलोकेषु देवत्वाय उपपत्ता महान् द्युति से सम्पन्न, महाबली, महान् यशस्वी, भवंति–महिडिएसु महज्जतीएसु महाबलेसु भवति–महर्द्धिकेषु महाधुतिकेषु महाबलेषु ___ महान् सौख्य-युक्त, महान् सामर्थ्य वाले, ऊंची गति महायसेसु महासोक्खेसु महाणुभागेसु दूरग- महायशःसु महासौख्येषु महानुभागेषु दूरगतिषु वाले और चिरकालिक स्थिति वाले किसी देवलोक तीसु चिरद्वितीएसु । से णं तत्य देवे भवइ चिरस्थितिकेषु । सः तत्र देवः भवति में देवरूप में उपपन्न होता है। वह महान् ऋद्धि महिडिए जाव दस दिसाओ उज्जोएमाणे महर्द्धिकः यावद् दश दिशः उद्द्योतयन् से सम्पन्न यावत् दसों दिशाओं को उयोतित और पभासेमाणे पासाइए दरिसणिजे अभिरूवे प्रभासयन् प्रासादीयः दर्शनीयः अभिरूपः । प्रभासित करता हुआ, द्रष्टा के चित्त को प्रसन्न पडिरूवे । से णं तत्य अण्णे देवे, अण्णेसि प्रतिरूपः । सः तत्र अन्यान् देवान् अन्येषां ___करने वाला, दर्शनीय, कमनीय और रमणीय' देवाणं देवीओ अभिमुंजिय-अभिमुंजिय देवानां देवीः अभियुज्य-अभियुज्य परि- देव होता है। वह अन्य देवों और देवों की देवियों परियारेइ, अप्पणिचियाओ देवीओ अभि- चारयति, आत्मीयाः देवीः अभियुज्य-अभि- का आश्लेष कर-कर परिचारणा करता है, अपनी जंजिय-अभिजंजिय परियारेइ, नो अप्प- युज्य परिचारयति, नो आत्मनैव आत्मानं देवियों का आश्लेष कर-कर परिचारणा करता णामेव अप्पाणं विउब्बिय-विउब्विय परि- विकृत्य-विकृत्य परिचारयति । है, किन्तु वह अपने बनाए हुए विभिन्न रूपों से यारेइ । परिचारणा नहीं करता । २. एगे वि य णं जीवे एगेणं समएणं एग २. एकोऽपि च जीवः एकेन समयेन एकं २. एक जीव एक समय में एक ही वेद का वेदन वेदं वेदेइ, तं जहा-इत्थिवेदं वा, पुरिसवेदं वेदं वेदयति, तद् यथा-स्त्रीवेदं वा पुरुषवेदं करता है, जैसे--स्त्रीवेद का अथवा पुरुषवेद वा । वा । जं समयं इत्थिवेदं वेदेइ, नो तं समयं यस्मिन् समये स्त्रीवेदं वेदयति, नो तस्मिन् जिस समय वह स्त्रीवेद का वेदन करता है, उस पुरिसवेदं वेदेइ । ___समये पुरुषवेदं वेदयति । समय पुरुषवेद का वेदन नहीं करता । जं समयं पुरिसवेदं वेदेइ, नो तं समयं यस्मिन् समये पुरुषवेदं वेदयति, नो तस्मिन् जिस समय वह पुरुषवेद का वेदन करता है, उस इत्थिवेदं वेदेइ । समये स्त्रीवेदं वेदयति । समय स्त्रीवेद का वेदन नहीं करता । इत्थिवेदस्स उदएणं नो पुरिसवेदं वेदेइ, स्त्रीवेदस्य उदयेन नो पुरुषवेदं वेदयति, वह स्त्रीवेद के उदय से पुरुषवेद का वेदन नहीं पुरिसवेदस्स उदएणं नो इत्थिवेदं वेदेइ । पुरुषवेदस्य उदयेन नो स्त्रीवेदं वेदयति ।। करता और पुरुषवेद के उदय से स्त्रीवेद का वेदन नहीं करता । एवं खल एगे जीवे एगेणं समएणं एगं वेदं एवं खलु एकः जीवः एकेन समयेन एकं वेदं । इस प्रकार एक जीव एक समय में एक ही वेद वेदेइ, तं जहा-इत्थीवेदं वा, पुरिसवेदं वेदयति, तद् यथा स्त्रीवेदं वा पुरुषवेदं का वेदन करता है, जैसे-स्त्रीवेद का अथवा या। वा। पुरुषवेद का। इत्थी इत्थिवेदेणं उदिण्णेणं पुरिसं पत्थेइ । स्त्री स्त्रीवेदेन उदीर्णेन पुरुषं प्रार्थयति । पुरुषः स्त्री उदयप्राप्त स्त्रीवेद के कारण पुरुष की इच्छा पुरिसो पुरिसवेदेणं उदिण्णेणं इत्थं पत्थेइ। पुरुषवेदेन उदीर्णेन स्त्रियं प्रार्थयति । द्वावपि करती है और पुरुष उदयप्राप्त पुरुषवेद के कारण दो वि ते अण्णमण्णं पत्थेति, तं जहा- तौ अन्योन्यं प्रार्थयतः, तद् यथा-स्त्री वा स्त्री की इच्छा करता है। वे दोनों परस्पर एक इत्थी या पुरिसं, पुरिसे वा इत्थिं ॥ पुरुषं, पुरुषो वा स्त्रियम् । दूसरे की इच्छा करते हैं, जैसे—स्त्री पुरुष की इच्छा करती है, पुरुष स्त्री की इच्छा करता है । पुमांसं प्रत्यभिलाष इत्यर्थः, तद्विपाकवेद्यं कर्मापि स्त्रीवेदः, पुरुषस्य वेदः पुरुषवेदः, पुरुषस्य स्त्रियं प्रत्यभिलाष इत्यर्थः, तद्विपाकवेद्यं कर्मापि पुरुषवेदः, नपुंसकस्य वेदो नपुंसकवेदः, नपुंसकस्य स्त्रियं पुरुषं च प्रत्यभिलाष इत्यर्थः तद्विपाकवेद्यं कर्मापि नपुंसकवेदः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003593
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 01 Bhagvai Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1994
Total Pages458
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size12 MB
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