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________________ प्र०१: समय: श्लो०१६-२३ १६. उन दोनों" (आत्मा और लोक)" का विनाश नहीं होता । असत् उत्पन्न नहीं होता । सभी पदार्थ सर्वथा नियतिभाव को प्राप्त हैं, शाश्वत हैं।०. सूयगडो १ १६. दुहओ ते ण विणस्संति णो य उप्पज्जए असं । सब्वेवि सव्वहा भावा णियतोभावमागया ।१६। १७. पंच खंधे वयंतेगे बाला उ खणजोइणो । अण्णो अणण्णो वाहु हेउयं व अहेउय।१७। द्वौ तौ न विनश्यतः, नो च उत्पद्यते असन् । सर्वऽपि सर्वथा भावाः, नियतिभावमागताः ॥ पञ्च स्कन्धान् वदन्ति एके, बालास्तु क्षणयोगिनः । अन्यं अनन्यं नवाहुः, हेतुकं च अहेतुकम् ।। १७. कुछ दार्शनिक (बौद्ध) पांच स्कंधो (रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार) का निरूपण करते हैं। वे स्कंध क्षणयोगी (क्षणिक) हैं । वे स्कंधों से अन्य या अनन्य आत्मा को नहीं मानते। वे स-हेतुक आत्मा को नहीं मानते। १८. धातुवादी बौद्ध यह मानते हैं कि पृथ्वी, पानी, अग्नि और वायु-इन चार धातुओं से शरीर निर्मित होता १८. पुढवो आऊ तेऊ य तहा वाऊ य एगो। चत्तारि धाउणो रूवं एवमाहंसु जाणगा।१८। १६. अगारमावसंता वि आरण्णा वा वि पव्वया । इमं दरिसणमावण्णा सव्व दुक्खा विमुच्चंति।१६। २०. तेणाविमं तिगच्चा णं ण ते धम्मविऊ जणा। जे ते उ वाइणो एवं ण ते ओहंतराहिया।२०। पृथ्वी आपः तेजश्च, तथा वायुश्च एककः । चत्वारि धातो: रूपाणि, एवमाहुः ज्ञायकाः ।। अगारमावसन्तोऽपि, आरपा: वाऽपि प्रजिताः। इदं दर्शनमापन्नाः, सर्वदुःखात् विमुच्यन्ते ।। १६. वे प्रवादी यह कहते हैं -गृहस्थ, आरण्यक या प्रवजित कोई भी हो, जो इस दर्शन में आ जाता है, वह सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है । तेनापि इदं विज्ञात्वा, न ते धर्मविदः जनाः । ये ते तु वादिनः एवं, न ते ओघंतरा: आहताः ॥ २०. किसी दर्शन में आ जाने" तथा त्रिपिटक आदि ग्रंथों को जान लेने से वे मनुष्य धर्मविद् नहीं हो जाते। (इस दर्शन में आ जाने से मनुध सब दुःखों से मुक्त हो जाते हैं) जो ऐसा कहते हैं वे दुःख के प्रवाह का तीर नहीं पा सकते ।५५ २१. तेणाविमं तिणच्चा णं ण ते धम्मविऊ जणा। जे ते उ वाइणो एवं ण ते संसारपारगा।२१॥ तेनापि इदं विज्ञात्वा, न ते धर्मविदः जनाः । ये ते तु वादिनः एवं, न ते संसारपारगाः॥ २१. किसी दर्शन में आ जाने तथा त्रिपिटक आदि ग्रंथों को जान लेने से वे मनुष्य धर्मविद् नहीं हो जाते । (इस दर्शन में आ जाने से मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाते हैं) जो ऐसा कहते हैं वे संसार के पार नहीं जा सकते। २२. तेणाविमं तिणच्चा णं ण ते धम्मविऊ जणा। जे ते उ वाइणो एवं ण ते गामस्स पारगा।२२॥ तेनापि इदं त्रिज्ञात्वा, न ते धर्मविदः जनाः। ये ते तु वादिनः एवं, न ते गर्भस्य पारगाः ।। २२. किसी दर्शन में आ जाने तथा त्रिपिटक आदि ग्रन्थों को जान लेने से वे मनुध धर्मविद् नहीं हो जाते । (इस दर्शन में आ जाने से मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाते हैं) जो ऐसा कहते हैं वे गर्भ के पार नहीं जा सकते। २३. तेणाविमं तिणच्चा णं ण ते धम्मविऊ जणा। जे ते उ वाइणो एवं ण ते जम्मस्स पारगा।२३। तेनापि इदं त्रिज्ञात्वा, न ते धर्मविदः जनाः । ये ते तु वादिनः एवं, न ते जन्मन: पारगाः ।। २३. किसी दर्शन में आ जाने तथा त्रिपिटक आदि ग्रन्थों को जान लेने से वे मनुष्य धर्मविद् नहीं हो जाते । (इस दर्शन में आ जाने से मनुष्य सब दुखों से मुक्त हो जाते हैं) जो ऐसा कहते हैं वे जन्म के पार नही जा सकते। Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003592
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Suyagado Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Dulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1984
Total Pages700
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size14 MB
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