SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 367
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सूपगडो १ ३३० अध्ययन ७ : टिप्पण १०-१३ अंडज, जरायुज, संस्वेदज और रसज- ये सब त्रस प्राणियों के प्रकार हैं । आचारांग में इनके अतिरिक्त तीन प्रकार और मिलते हैं—ो उभिन और औपपातिक १०. जाति पथ (जन्म-मरण) में ( जाईपहं) 'जाति' का अर्थ है जन्म, और 'पह' का अर्थ है- पथ, मार्ग । जाईपहं अर्थात् उत्पत्ति का मार्ग । तात्पर्य में इसका अर्थ है – संसार, जन्म-मरण की परंपरा । चूर्णिकार ने 'जाई वह' पाठ मानकर 'जाई' का अर्थ जन्म और 'वह' का अर्थ मरण किया है। ११. विनिघात (शारीरिक मानसिक दुःख) को (विविधा) श्लोक ४८ : विनिघात का अर्थ है - शारीरिक और मानसिक दुःख का उदय अथवा कर्मों का फल -बिपाक । वृत्तिकार ने इसका अर्थ विनाश किया है। " १२. जन्म-जन्म में (जाति जाति) चूर्णिकार ने इस दोहरे प्रयोग को 'बीप्सा' के अर्थ में माना है । अर्थात् उन उन जातियों में, त्रस स्थावर जातियों में । " १३. भर जाता है (मिज्जति) इसका संस्कृत रूप है --मीयते। यह रूप दो धातुओं से बनता है १. माङ्क माने मीयते । २. मी हिंसायां - मीयते । एक का अर्थ है---भरना और दूसरे का अर्थ है - हिंसा करना । इन दोनों के आधार पर इस चरण का अर्थ होगा १. वह अज्ञानी प्राणियों को पीड़ित करने वाला जो कर्म करता है, उससे वह भर जाता है । २. वह अज्ञानी उसी कर्म के द्वारा मारा जाता है अथवा 'यह चोर है' 'यह पारदारिक है'- इस प्रकार लोक में वह बताया जाता है। " - Jain Education International चूर्णिकार ने 'मज्जते' पाठ की भी सूचना दी है। उसका अर्थ है-निमग्न होना, डूबना プ १. आयारो, १११८ से बेमि-संतिमे तसा पाणा, तं जहा अंडया पोयया जराउया रसया संसेयया समुच्छिमा उन्मिया ओववाइया । २. वृत्ति, पत्र १५५ । ३. चूर्ण, पृ० १५३ : जातिश्च बधश्च जाति-वधौ, जन्म-मरण इत्युक्तं भवति । ४. चूर्ण, पृ० १५३ : अधिको णियतो वा घातः निघातः, विविधो वा घातः शरीरमानसा दुःखोदया अट्ठपगार कम्मफलवित्रागो वा । ५. वृत्ति, पत्र १५५ ६. णि, पृ० १५३ ७. वृत्ति पत्र १५५ विनिघातं विनाशम् । जातिजानीति बीसार्थ तेनेच कर्मणामीयते : ८. वृत्ति, पत्र १५५ । ६. चूर्ण, पृ० १५३ : मज्जते वा निमज्जइ इत्यर्थः । तासु तासु जाति त्ति तस-यावरजातिसु । यते पूर्वते यदि वा 'मी हिंसायां नीयते हिते। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003592
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Suyagado Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Dulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1984
Total Pages700
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size14 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy