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________________ यूयगडो १ १०६ अध्ययन २: टिप्पण ४३-४६ भी शयन-आसन मिलें उसमें वह अकेला होने का अनुभव करे-राग-द्वेष न करे । जन-संपर्क का माध्यम है-वचन । जो उसका प्रयोग नहीं करता, वह अपने आप अकेला हो जाता है। मन के विकल्प व्यक्ति को दंत में ले जाते हैं। उसका संवरण करने वाला अपने आप अकेला हो जाता है। भाव की रष्टि से प्रत्येक भिक्षु को अकेला होना चाहिए । द्रव्य की दृष्टि से अकेले रहने का निर्देश उस भिक्षु के लिए है जो साधना के लिए संघ से मुक्त होकर एकलविहारी हो गया है। श्लोक ३५: ४३. श्लोक ३५: प्रस्तुत श्लोक में एकलविहारी मुनि की चर्या प्रतिपादित है। एकलविहारी मुनि पूछने पर भी नहीं बोलता । कुछेक वचन बोलता है। कोई संबोधि प्राप्त करने वाला हो तो उसके लिए एक, दो, तीन या चार उदाहरणों का प्रतिपादन कर सकता है । वह अपने बैठने के स्थान का प्रमार्जन करता है, किन्तु शेष घर का प्रमार्जन नहीं करता।' ४. शून्यगृह का (सुग्णघरस्स) चूर्णिकार ने शून्य शब्द के दो निरुक्त किए हैं १. शूनां हितं शून्यं-जो कुत्तों के लिए हितकर हो। २. शून्यं वा यत्राऽन्यो न भवति-जिसमें दूसरा कोई न हो। ४५. (वई) चूर्णिकार के अनुसार एकलविहारी मुनि पूछने पर चार भाषाएं बोल सकता है। वे चार भाषाएं हैंयाचनी-याचना से सम्बन्ध रखने वाली भाषा । प्रच्छनी-मार्ग आदि तथा सूत्रार्थ के प्रश्न से सम्बन्धित भाषा। अनुज्ञापनी--स्थान आदि की आज्ञा लेने से सम्बन्धित भाषा । पृष्टव्याकरणी-पूछे हुए प्रश्नों का प्रतिपादन करने वाली भाषा। वृत्तिकार ने सावध वचन बोलने का निषेध किया है और जो अभिग्रहवान तथा जिनकल्पिक है, उसे निरवद्य भाषा भी नहीं बोलनी चाहिए, ऐसा मत प्रगट किया है।" श्लोक ३६ : ४६.चींटी, खटमल आदि (चरगा) इसका शाब्दिक अर्थ है-चलने-फिरने वाले प्राणी । चूर्णिकार ने चींटी, खटमल आदि को इसके अन्तर्गत माना है। वृत्तिकार ने चरक शब्द से दंश, मशक का ग्रहण किया है। शब्द की दृष्टि से चूर्णिकार का मत उपयुक्त लगता है। दंश, मशक उड़ने वाले प्राणी हैं, न कि चलने वाले । १. चूणि, पृ० ६३ : द्रव्ये एगलविहारवान्, भावे राग-द्वेषरहितो वीतरागः ........... एगो राग-द्दोसरहितो, सम्वत्यपवाद-णिवाद ___सम-विसमेसु ठाण-णिसीयण-प्तयणेसु एगभावेण भवितव्वं । २. वही, पृ०६३ । ३. वही, पृष्ठ ६३ : अवस्सं संबुज्झितुकामस्स वा एगनायं एवावागरणं वा जाव चत्तारि। णिसीयणढाणे मोत्तण सेसं वधि ग __समुच्छति ति ण पमज्जति । ४. वही, पृष्ठ ६३ : शुनां हितं शून्यं, शून्यं वा यत्रान्यो न भवति । ५. वही, पृ०६३ : एगल्लविहारी ... 'चत्तारि भासाओ मोत्तण ण उदाहरति यि । ६. ठाणं ४१२२ : पडिमापडिवण्णस्स गं अणगारस्स कप्पंति चत्तारि भासाओ भासित्तए, तंजहा-जायणी, पुच्छणी, अणुण्णवणी पुट्ठस्स वागरणी। ७. वृत्ति, पत्र ६६ : सावद्यां वाचं ....'न ब यात्, आभिग्रहिको जिनकल्पिकादिनिरवद्यामपि न वयात् । ८. चूणि, पृष्ठ ६४ : चरन्तीति चरका: पिपीलिका-मत्कुण-घृतपायिकादयः । ६. वृत्ति, पत्र ६६ : चरन्तीति चरका-वंशमशकादयः । Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003592
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Suyagado Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Dulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1984
Total Pages700
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size14 MB
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