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________________ [दशावतस्कन्ध 12. नया कलह उत्पन्न करना—विना विवेक के बोलने से कलह उत्पन्न हो जाते हैं। द्रौपदी के एक अविवेक भरे वचन से महाभारत का घोर संग्राम हुआ / अतः कलह उत्पन्न होने वाली भाषा का प्रयोग करना बारहवां असमाधिस्थान है / 13. पुराने कलह को पुनः उभारना-विना विवेक के कई बार ऐसी भाषा का प्रयोग हो जाता है जिससे उपशांत कलह पुनः उत्तेजित हो जाता है / भिक्षु को ऐसी भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं है / उपशान्त कलह को पुनः उत्तेजित करना तेरहवां असमाधिस्थान है। 14. अकाल में स्वाध्याय करना-सूर्योदय और सूर्यास्त का समय तथा मध्याह्न और मध्यरात्रि का एक-एक मुहूर्त का समय स्वाध्याय के लिए अकाल कहा गया है। कालिक सूत्रों के स्वाध्याय के लिए दूसरा और तीसरा प्रहर अस्वाध्याय काल कहा गया है। इसके सिवाय प्रौदारिक संबंधी 10, आकाश संबंधी 10 और महोत्सव संबंधी 10 अस्वाध्याय भी अकाल हैं / भगवदाज्ञा का उल्लंघन तथा अन्य दैवी उपद्रव होने की संभावना रहने से अकाल में स्वाध्याय करना चौदहवां असमाधिस्थान है। 15. सचित्त रज-युक्त हाथ-पैर प्रादि का प्रमार्जन न करना-भिक्षु भिक्षा के लिए जाए या विहार करे, उस समय उसके हाथ-पैर आदि पर यदि कभी सचित्त रज लग जाए तो उसका प्रमार्जन किए बिना बैठना, शयन करना, आहारादि करना असमाधि का हेतु है / क्योंकि अयतनाःअसमाधि का और यतना समाधि का हेतु है। जिनकल्पी अपनी चर्या के अनुसार जब तक हाथ-पैर आदि पर सचित्त रज रहती है, तब तक बैठना, शयन करना, आहार करना आदि नहीं करते हैं। एक वैकल्पिक अर्थ यह भी है जिस गृहस्थ के हाथ-पैर आदि सचित्त रज से लिप्त हों तो उसके हाथ से पाहारादि लेना यह पन्द्रहवां असमाधिस्थान है। 16. बहुभाषी होना-बहुत ज्यादा बोलना कलह-उत्पत्ति का कारण हो सकता है। वैसे तो मौन रहना सबसे अच्छा है, मौन भी एक प्रकार का तप है, किन्तु मौन न रह सकें तो अनावश्यक भाषण करना तो सर्वथा अनुचित है / यह सोलहवां असमाधिस्थान है। 17. संघ में मतभेद उत्पन्न करना-समाज में मतभेद उत्पन्न करने वाली युक्तियों का प्रयोग करना, यह सत्रहवां असमाधिस्थान है। 18. कलह करना-प्रायः असत्य भाषण से कलह उत्पन्न होता है, किन्तु कभी-कभी सत्य भाषण से भी कलह हो जाता है। सत्य एवं मृदु भाषा कल्याणकारी होती है। अतः अप्रिय, कटुक, कठोर, कलहकारी भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं है। यह अठारहवां असमाधिस्थान है। 19. सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ न कुछ खाते रहना-भोजन के समय भोजन कर लेना और बाद में भी सारा दिन कुछ न कुछ खाते रहने से शरीर तो अस्वस्थ होता ही है, साथ ही रसास्वादन की प्रासक्ति बढ़ जाती है / इस प्रकार की प्रवृत्ति करने वाले भिक्षु को उत्तरा. श्र. 17 में पाप-श्रमण कहा है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003495
Book TitleAgam 27 Chhed 04 Dashashrutskandh Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages206
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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