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________________ 244] [बृहत्कल्पसूत्र (तिल-तुष जितना) भूति-प्रमाण (एक चुटकी जितना) खाना तथा पानी बिन्दुप्रमाण जितना भी पीना नहीं कल्पता है, केवल उग्र रोग एवं आतंक में कल्पता है। 47. निर्ग्रन्थों और निर्ग्रन्थियों को अपने शरीर पर सभी प्रकार के परिवासित लेपन एक बार या बार-बार लगाना नहीं कल्पता है, केवल उग्र रोग एवं प्रातंकों में लगाना कल्पता है। 48. निर्ग्रन्थों और निर्ग्रन्थियों को अपने शरीर पर परिवासित तेल यावत् नवनीत को चुपड़ना या मलना नहीं कल्पता है, केवल उग्र रोग या अातंकों में कल्पता है। विवेचन-निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थियों को खाने-पीने योग्य और लेपन-मर्दन करने योग्य पदार्थों का संचय करना तथा रात्रि में उन पदार्थों का लाना, रखना एवं उनका उपयोग करना उत्सर्गमार्ग में सर्वथा निषिद्ध है और इन कार्यों के लिये प्रायश्चित्त का भी विधान है। क्योंकि इन कार्यों के करने से संयमविराधना होती है। भाष्य में इस विषय का विस्तृत वर्णन है। उग्र रोग या अातंक होने पर पूर्वोक्त अत्यन्त आवश्यक पदार्थों के संचय करने का तथा रात्रि में परिवासित रखने का एवं उनके उपयोग करने का अपवादमार्ग में ही विधान है। गीतार्थ यदि यह जान ले कि निकट भविष्य में उग्न रोग या आतंक होने वाला है, महामारी या सेनाओं के आतंक से गांव खाली हो रहे हैं, स्थविर रुग्ण हैं, चलने में असमर्थ हैं, आवश्यक औषधियां आस-पास के गांवों में न मिलने के कारण दूर गांवों से लाई गई हैं, इत्यादि कारणों से उक्त पदार्थों का संचय कर सकते हैं, रात्रि में परिवासित रख सकते हैं एवं उनका उपयोग भी कर सकते हैं। चन्दन, कायफल, सोंठ आदि द्रव्य लेपन योग्य होते हैं। शिला पर घिस कर या पीसकर इनका लेप तैयार किया जाता है। मालेपन---एक बार लेपन करना / विलेपन-बार-बार लेपन करना / अथवा आलेपन-शरीर में जलन आदि होने पर सर्वांग में लेप करना। विलेपन-मस्तक आदि विशिष्ट अंग पर लेप करना / निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थियों को सौन्दर्यवृद्धि के लिए किसी प्रकार के पालेपन-विलेपन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। केवल रोगादि की शान्ति के लिए लेप्य पदार्थों का प्रयोग कर सकते हैं / आगाढ रोगातंक में इन पदार्थों को रात्रि में भी रखा जा सकता है। इन सूत्रों में रात्रि में रखे गये पदार्थों का परिस्थितिवश खाने एवं उपयोग में लेने का विधान किया गया है। इससे रात्रि में खाना या उपयोग में लेना न समझकर परिवासित पदार्थों को दिन में उपयोग में लेने का ही समझना चाहिये / दुर्लभ द्रव्यों को रात में रखने की एवं प्रबल रोगातंक में दिन में उपयोग लेने की छूट सूत्र से समझ लेनी चाहिये / भिन्न-भिन्न पदार्थों को रात्रि में किस विवेक से किस प्रकार रखना, इसकी विधि भाष्य से जाननी चाहिये। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003493
Book TitleAgam 25 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages217
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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