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________________ 204] [बृहत्कल्पसूत्र श्रुत एवं अर्थ की वाचना देनी चाहिए। क्योंकि ये प्रतिपादित तत्त्व को सरलता से या सुगमता से ग्रहण करते है। ग्लान को मैथुनभाव का प्रायश्चित्त 14. निग्गथि च णं गिलायमाणि पिया वा भाया वा पुत्तो वा पलिस्सएज्जा, तं च निगायी साइज्जेज्जा मेहुणपडिसेवणपत्ता आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्धाइयं / 15. निगंथं च गिलायमाणं माया वा भगिणी या धूया वा पलिस्सएज्जा, तं च निग्गथे साइज्जेज्जा मेहुणपडिसेवणपत्ते आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्धाइयं / 14. ग्लान निर्ग्रन्थी के पिता, भ्राता या पुत्र गिरती हुई निर्ग्रन्थी को हाथ का सहारा दें, गिरी हुई को उठावें, स्वतः उठने-बैठने में असमर्थ को उठावें बिठावें, उस समय वह निर्ग्रन्थी मैथुनसेवन के परिणामों से पुरुषस्पर्श का अनुमोदन करे तो वह अनुद्घातिक चातुर्मासिक प्रायश्चित्त की पात्र होती है। 15. ग्लान निर्ग्रन्थ की माता, बहिन या बेटी गिरते हुए निर्ग्रन्थ को हाथ का सहारा दें, गिरे हुए को उठाएँ, स्वतः बैठने-उठने में असमर्थ को उठाएँ, बिठाएँ, उस समय वह निर्ग्रन्थ मैथुनसेवन के परिणामों से स्त्रीस्पर्श का अनुमोदन करे तो वह अनुद्घातिक चातुर्मासिक प्रायश्चित्त का पात्र होता है। विवेचन-साध्वी के लिए पुरुष के शरीर का स्पर्श और साधु के लिए स्त्री के शरीर का स्पर्श ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए सर्वथा वजित है। बीमारी आदि के समय भी साध्वी की साध्वी और साधु की साधु ही परिचर्या करें, यही जिन-प्राज्ञा है। किन्तु कदाचित् ऐसा अवसर प्रा जाय कि कोई साध्वी शरीर-बल के क्षीण होने से कहीं पर आते या जाते हुए गिर जाय और उसे देखकर उस साध्वी का पिता, भाई या पुत्रादि कोई भी पुरुष उसे उठाए, बिठाए या अन्य शरीर-परिचर्या करे तब उसके शरीर के स्पर्श से यदि साध्वी के मन में काम-वासना जागृत हो जाय तो उसके लिए चातुर्मासिक अनुद्घातिक प्रायश्चित्त कहा गया है। इसी प्रकार बीमारी आदि से क्षीणबल कोई साधु कहीं गिर जाय और उसकी माता, बहिन या पुत्री आदि कोई भी स्त्री उसे उठाए, तब उसके स्पर्श से यदि साधु के मन में काम-वासना जग जाय तो वह साधु गुरुचातुर्मासिक प्रायश्चित्त का पात्र कहा गया है। यहां प्रायश्चित्त कहने का तात्पर्य यह है कि वह रुग्ण साधु या साध्वी स्पर्शपरिचारणा का अनुभव करे तो वे उक्त प्रायश्चित्त के भागी होते हैं। प्रथम प्रहर के आहार को चतुर्थ प्रहर में रखने का निषेध 16. नो कप्पइ निग्गंथाण वा, निग्गंथोण वा असणं वा जाव साइमं वा, पढमाए पोरिसीए पडिग्गाहेत्ता, पच्छिमं पोरिसि उवाइणावेत्तए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003493
Book TitleAgam 25 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages217
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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