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________________ 192] [बृहत्कल्पसूत्र सूत्र में 'अचित्त' शब्द का प्रयोग इसलिये किया गया है कि उपाश्रय में तो कई सचित्त पदार्थ भी हो सकते हैं। भिक्षु को सचित्त अथवा जीवयुक्त उपकरण लेना नहीं कल्पता है, अतः अचित्त और उपयोग में आने योग्य उपकरण हों तो ही भिक्षों की पूर्वगृहीत आज्ञा से ग्रहण किये जा सकते हैं। यदि यह ज्ञात हो जाए कि इन उपकरणों की पूर्व भिक्षुत्रों ने स्वामी से प्राज्ञा नहीं ली है तो आगन्तुक भिक्षु को उनकी आज्ञा लेना आवश्यक होता है। सूत्र का प्राशय यह है कि पूर्व भिक्षुओं ने जिस मकान की एवं जिन उपकरणों की आज्ञा ले रखी है उनकी पुनः आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं होती है। स्वामी-रहित घर की पूर्वाज्ञा एवं पुनः आज्ञा का विधान ___30. से वत्थूसु-अव्वावडेसु, अव्योगडेसु, अपरपरिग्गहिएसु, अमरपरिग्गहिएसु सच्चेव उग्गहस्स पुवाणुण्णवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे। 31. से वत्थूसु–वावडेसु, बोगडेसु, परपरिग्गहिएसु, भिक्खुभावस्स अट्ठाए दोच्चपि उग्गहे अणुनवेयव्वे सिया अहालन्दमवि उग्गहे। 30. जो घर काम में न आ रहा हो, कुटुम्ब द्वारा विभाजित न हो, जिस पर किसी अन्य का प्रभुत्व न हो अथवा किसी देव द्वारा अधिकृत हो तो उसमें भी उसी पूर्वस्थित साधुनों की आज्ञा से जितने काल रहना हो, ठहरा जा सकता है। 31. वही घर आगन्तुक भिक्षुत्रों के ठहरने के बाद में काम में आने लगा हो, कुटुम्ब द्वारा विभाजित हो गया हो या अन्य से परिगहीत हो गया हो तो भिक्षु भाव अर्थात् संयममर्यादा के लिये जितने समय रहना हो उसकी दूसरी बार आज्ञा ले लेनी चाहिये / विवेचन-१. अव्यापृत-जो घर जीर्ण-शीर्ण होने से या गिर जाने से किसी के द्वारा उपयोग में नहीं पा रहा है, उसे 'अव्यापृत' कहते हैं / 2. अव्याकृत--जो घर अनेक स्वामियों का होने से किसी के द्वारा अपने अधीन नहीं किया गया है, उसे 'अव्याकृत' कहते हैं। 3. अपरपरिगृहीत-जो घर गृहस्वामी ने छोड़ दिया हो और अन्य किसी व्यक्ति के द्वारा परिगृहीत नहीं है, किन्तु बिना स्वामी का है, उसे 'अपरपरिगृहीत' कहते हैं। 4. अमरपरिगृहीत--जो घर किसी कारण-विशेष से निर्माता के द्वारा छोड़ दिया गया है और जिसमें किसी यक्ष आदि देव ने अपना निवास कर लिया है, उसे 'अमरपरिगृहीत' कहते हैं। उक्त स्थान से साधु विहार कर अन्यत्र जाने वाले हैं। उस समय आने वाले साधुनों को उसमें ठहरने के लिए पुनः आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पूर्व स्थित साधुओं के द्वारा ली गई अनुज्ञा ही आज्ञा मानी जाती है / आगन्तुक साधुनों के ठहरने पर देवता ने उस मकान को छोड़ दिया हो और उसके बाद उस मकान का कोई वास्तविक मालिक आ जावे तो वास्तविक मालिक को पुनः प्राज्ञा लेना आवश्यक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003493
Book TitleAgam 25 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages217
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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