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________________ विस्तारभय से यह सभी वर्णन यहाँ न देकर जिज्ञासुमों को प्रेरित करते हैं कि वे लेखक का 'ऋषभदेव : एक . परिशीलन' ग्रन्थ तथा धर्मकथानयोग की प्रस्तावना का अवलोकन करें। अन्य प्रारक वर्णन भगवान् ऋषभदेव के पश्चात् दुष्षमसुषमा नामक प्रारक में तेईस अन्य तीर्थकर होते हैं और साथ ही उस काल में ग्यारह चक्रवर्ती, नौ बलदेव और नो वासुदेव प्रादि श्लाघनीय पुरुष भी समुत्पन्न होते हैं। पर उनका वर्णन प्रस्तुत आगम में नहीं पाया है। संक्षेप में ही इन आरकों का वर्णन किया गया है। छठे प्रारक का वर्णन कुछ विस्तार से हुआ है। छठे प्रारक में प्रकृति के प्रकोप से जन-जीवन अत्यन्त दुःखी हो जायेगा / सर्वत्र हाहाकार मच जायेगा / मानव के अन्तर्मानस में स्नेह-सद्भावना के अभाव में छल-छद्म का प्राधान्य होगा / उनका जीवन अमर्यादित होगा तथा उनका शरीर विविध व्याधियों से संत्रस्त होगा। गंगा और सिन्धु जो महानदियाँ हैं, वे नदियों भी सूख जायेंगी। रथचक्रों की दूरी के समान पानी का विस्तार रहेगा तथा रथचक्र की परिधि से केन्द्र की जितनी दूरी होती है, उतनी पानी की गहराई होगी। पानी में मत्स्य और कच्छप जैसे जीव विपुल मात्रा में होंगे / मानव इन नदियों के सन्निकट वैताठ्य पर्वत में रहे हुए बिलों में रहेगा। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय बिलों से निकलकर वे मछलियाँ और कछुए पकड़ेंगे और उनका आहार करेंगे। इस प्रकार इक्कीस हजार वर्ष तक मानव जाति विविध कष्टों को सहन करेगी और वहाँ से मायु पूर्ण कर वे जीव नरक और तिर्यञ्च गति में उत्पन्न होंगे। अवसर्पिणी काल समाप्त होने पर उत्सर्पिणी काल का प्रारम्भ होगा। उत्सपिणी काल का प्रथम मारक अवसर्पिणी काल के छठे प्रारक के समान ही होगा और द्वितीय प्रारक पंचम मारक के सदृश होगा। वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श प्रादि में धीरे-धीरे पुनः सरसता की अभिवृद्धि होगी। क्षीरजल, घतजल और ममतजल की बुष्टि होगी, जिससे प्रकृति में सर्वत्र सुखद परिवर्तन होगा। चारों ओर हरियाली लहलहाने लगेगी। शीतल मन्द सुगन्ध पवन ठुमक-ठुमक कर चलने लगेगा। बिलवासी मानव बिलों से बाहर निकल आयेंगे और प्रसन्न होकर यह प्रतिज्ञा ग्रहण करेंगे कि हम भविष्य में मांसाहार नहीं करेंगे और जो मांसाहार करेगा उनकी छाया से भी हम दूर रहेंगे। उत्सपिणी के तृतीय प्रारक में तेईस तीर्थंकर, ग्यारह चक्रवर्ती, नौ वासुदेव, नौ बलदेव आदि उत्पन्न होंगे। चतुर्थ आरक के प्रथम चरण में चौवीसवें तीर्थंकर समुत्पन्न होंगे और एक चक्रवर्ती भी। अवपिणी काल में जहां उत्तरोत्तर हास होता है, वहीं उत्सपिणी काल में उत्तरोत्तर विकास होता है। जीवन में अधिकाधिक सुख-शान्ति का सागर ठाठे मारने लगता है। चतुर्थ मारक के द्वितीय चरण से पुनः योगलिक काल प्रारम्भ हो जाता है। कर्मभूमि से मानव का प्रस्थान भोगभूमि की पोर होता है। इस प्रकार द्वितीय वक्षस्कार में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल का निरूपण हुआ है। यह निरूपण ज्ञानवर्द्धन के साथ ही साधक के अन्तर्मानस में यह भावना भी उत्पन्न करता है कि मैं इस कालचक्र में अनन्त काल से विविध योनियों में परिभ्रमण कर रहा है। अब मुझे ऐसा उपक्रम करना चाहिये जिससे सदा के लिये इस चक्र से मुक्त हो जाऊं। विनीता जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति के तृतीय वक्षस्कार में सर्वप्रथम विनीता नगरी का वर्णन है। उस विनीता नगरी की / अवस्थिति भरतक्षेत्र स्थित वैताढ्य पर्वत के दक्षिण के 11431 योजन तथा लवणसमुद्र के उत्तर में 1141 // योजन की दूरी पर, गंगा महानदी के पश्चिम में और सिन्धु महानदी के पूर्व में दक्षिणार्द्ध भरत के मध्यवर्ती तीसरे भाग के ठीक बीच में है। विनीता का ही अपर नाम अयोध्या है। जनसाहित्य की दृष्टि से यह नगर [34] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003486
Book TitleAgam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1986
Total Pages480
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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