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________________ 94] जिम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्र धारण किया। अधिक क्या कहें, इस प्रकार अलंकृत--अलंकारयुक्त, विभूषित वेशभूषा से विशिष्ट सज्जायुक्त राजा ऐसा लगता था, मानो कल्पवृक्ष हो। अपने ऊपर लगाये गये कोरंट पुष्पों की मालाओं से युक्त छत्र, दोनों ओर डुलाये जाते चार चँवर, देखते ही लोगों द्वारा किये गये मंगलमय जय शब्द के साथ राजा स्नान-गृह से बाहर निकला। स्नानघर से बाहर निकलकर अनेक गणनायकजनसमुदाय के प्रतिनिधि, दण्डनायक--आरक्षि-अधिकारी, राजा-माण्डलिक नरपति, (ईश्वरऐश्वर्यशाली या प्रभावशील पुरुष, तलवर-राज-सम्मानित विशिष्ट नागरिक, माडंबिकजागीरदार, भूस्वामी, कौटुम्बिक-बड़े परिवारों के प्रमुख, मंत्री, महामंत्री-मंत्रीमण्डल के प्रधान, गणक--- गणितज्ञ या भाण्डागारिक, दौवारिक-प्रहरी, अमात्य-मंत्रणा आदि विशिष्ट कार्य-सम्बद्ध उच्च राजपुरुष, चेट--चरणसेवी दास, पीठमर्द-राजसभा में राजा के निकट रहते हए विशिष्ट सेवारत वयस्य, नगर-नागरिकवृन्द, निगम--- नगर के वणिक-प्रावासों के बड़े सेठ, सेनापति तथा सार्थवाहअनेक छोटे व्यापारियों को साथ लिए देशान्तर में व्यापार-व्यवसाय करने वाले), दूत संदेशवाहक, संधिपाल-राज्य के सीमान्त-प्रदेशों के अधिकारी-इन सबसे घिरा हुआ राजा धवल महामेघ--श्वेत, विशाल बादल से निकले, ग्रहगण से देदीप्यमान आकाशस्थित तारागण के मध्यवर्ती चन्द्र के सदृश देखने में बड़ा प्रिय लगता था। वह हाथ में धूप, पुष्प, गन्ध, माला-पूजोपकरण लिए हुए स्नानघर से निकला, निकलकर जहाँ प्रायुधशाला थी, जहाँ चक्ररत्न था, वहाँ के लिए चला। 56 तए णं तस्स भरहस्स रण्णो बहवे ईसरपभिइयो अप्पेगइना पउमहत्थगया, अप्पेगइया उप्पलहत्थगया, (अप्पेगइया कुमुअहत्थगया, अप्पेगइया नलिणहत्थगया, अप्पेगइमा सोगन्धिअहत्थगया, अप्पेगइया पुंडरीयहत्थगया, अप्पेगइमा सहस्सपत्तहत्थगया,) अप्पेगइमा सयसहस्सपत्तहत्थगया भरहं रायाणं पिट्ठो पिट्ठओ अणुगच्छंति / तए णं तस्स भरहस्स रण्णो बहूईप्रो(गहायो) खुज्जा चिलाइ वामणि वडभीओ बरबरी बउसिपात्रो / जोणिय-पह लवियानो इसिणिय-थारुकिणियानो // 1 // लासिय-लउसिय-दमिली सिंहलि तह प्रारबी पुलिंदी य। पक्कणि बहलि मुरुडी सबरोश्रो पारसीनो य // 2 // अध्पेगइया बंदणकलसहत्थगआयो, भिंगारआदंसथालपातिसुपइट्ठगवायकरगरयणकरंडपुष्फचंगेरीमल्लवण्णचुण्णगंधहत्थगनायो, वत्थआभरणलोमहत्थयचंगेरीपुप्फपडलहत्थगआनो जाव लोमहत्थगाओ, अप्पेगइयाओ सीहासणहत्थगानो, छत्तचामरहत्थगआनो, तिल्लसमुग्गयहत्थगआयो, (गाहा) तेल्ले-कोट्टसमुग्गे, पत्ते चोए अ तगरमेला य / हरिश्माले हिंगुलए, मणोसिला सासवसमुग्गे // 1 // अप्पेगइमाओ तालिअंटहत्थगयाओ, अप्पेगइयाओ धूवकडुच्छुअहत्थगयाओ भरहं रायाणं पिट्टो पिट्ठओ अणुगच्छंति / . तए णं से भरहे राया सव्विड्डीए, सव्वजुईए, सव्वबलेणं, सव्वसमुदयेणं, सव्वायरेणं, सन्धविभूसाए, सव्वविभूईए, सधवत्थपुप्फगंधमल्लालंकारविभूसाए, सन्वतुडिअसहसणिणाएणं, महया इड्डीए, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003486
Book TitleAgam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1986
Total Pages480
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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