________________ की अपेक्षा प्राचीन गाणितिक एवं खगोलीय परिभाषाओं को समझे बिना तुष-कुट्टन के समान ही निष्फल हो मकता है। - अन्त में मैं एक बात और कहना चाहता हूँ कि भारतीय संस्कृति के इन अपूर्व ग्रन्थ-रत्नों के चिरन्तन सत्य के परिचायक तत्त्वों की खोज में विद्वान गवेषकों एवं चिन्तकों को जैन, वैदिक और बौद्ध परम्परा के ग्रन्थों का संयुक्त रूप से परिशीलन करना चाहिये, क्योंकि ये तीनों धाराएँ प्रारम्भ से ही एक ही लक्ष्य से बही हैं किन्तु बीच के साम्पातिक काल में कुछ तो स्वयं के दराग्रहों से और कूछ पराये लोगों के बहकावे के कारण विश्र खलित हो गई हैं / जब तक परस्पर मिलकर एक-दूसरे की न्यूनताओं को पूर्ण नहीं किया जाएगा तब तक पूर्णता की प्राप्ति आकाश-पुष्प ही बनी रहहेगी। अत: यूयं यूयं वयमिह वयं सर्वदैवं बुवभिहन्ता हन्ताग्रह-निपतितंभ्र शितं नैव किं किम / सञ्चिन्त्यातः पुनरपि निजं स्वत्वमुद्धतमार्या, यूयं ये ते बयमिति मिथ: स्वात्मना संबदन्तु / / यही निवेदन है, कामना, है और प्रार्थना है ।।ॐ॥ [ 41] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org