________________ जस 5. पुनर्वसु घय 6. पुष्य खीर 7. अश्लेषा दीवममंस कवचसिंग अथवा कमल 8. मघा कसारि केशर (?) अथवा केसार 9. पूर्वाफाल्गुनी मेढगमंस एलायची अथवा पाल 10. उत्तराफाल्गुणी ण क्खिमंस लसणकंद अथवा आल 11. हस्त वत्थाणिएम सिंघाडा 12. चित्रा मगसूए मूंग की दाल 13. स्वाति फल 14. विशाखा आतिसिया पाठली अथवा शाक 15. अनुराधा मासा करेण मिश्र कुरो धान्य 16. ज्येष्ठा कोलठ्ठिय कोला-कद्दू 17. मूल मूलक मूली अथवा मोगरे का शाक 18. पूर्वाषाढा प्रामलग यांबला 19. उत्तराषाढा विल्ल विल्व फल अथवा पक्का नींबू 20. अभिजित पुष्फ पुष्प 21. श्रवण खीर 22. धनिष्ठा करेला अथवा सक्कर कोला 23. शतभिषा तुम्बरात तुंबा 24. पूर्वाभाद्रपदा कारियए करेला 25. उत्तरभाद्रपदा बराहमंस कपूर 26. रेवती जलयरमंस जलचर फलन अथवा पानी 27. अश्विनी तित्तरमंस सीताफल 28. भरणी तिल तंदुल तिल्ली का तेल अथवा चावल इस तरह अट्ठाईस नक्षत्रों के भोजन का विषय जैसा अन्य स्थान में देखने में प्राया है वैसा ही लिखा है। टीकाकार श्री मलयगिरि आचार्य ने इसको टीका नहीं की है। तत्त्व केवलिगम्य / -प्राचार्य प्रमोलकऋषि जी म. प्राचार्य श्री हस्तीमलजी महाराज द्वारा सम्पादित--सूर्यप्रज्ञप्ति पा. 10 अन्तरपाहुड-१७ पृ. 220-223. ११-उपसंहार एवं कर्तव्य-बोध ___ इन सब विवेचनों के द्वारा हम एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि "विश्व को सर्वांश में सर्वज्ञ ही जानते हैं। बुद्धिजीवी जगत् इसकी समग्रता को पहचानने में सदैव अक्षम ही रहा है। विज्ञेय आधिभौतिक तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये आधिदैविक और प्राध्यात्मिक भूमिकारूढ हुए बिना जीव-जगत की जिज्ञासा पूर्ण नहीं हो सकती। अलोकिक तत्त्वोपलब्धि अथवा सत्य का साक्षात्कार प्रागमों के द्वारा ही सम्भव है। यही कारण है कि विश्व विद्याओं के निधान आगमों का प्रत्येक अक्षर सभी के लिये बहुमान्य है। सर्वज्ञ की वाणी होने से उसका प्रत्येक अंश सत्य है, श्रद्धेय है और उपास्य है और साथ ही यह भी ध्यातव्य है कि "आगम-साहित्य के वास्तविक तत्त्वों को समझने के उनके लिए मर्मज्ञ मनीषियों से पारम्परिक सम्प्रदायार्थ का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, तभी हम कुछ जान सकते हैं / सूर्य-प्रज्ञप्ति भी एक ऐसा ही पागम ग्रन्थ है, जिसके रहस्यार्थ का परिज्ञान आधुनिक परिभाषाओं [40] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org