________________ यद्यपि अधिकांश प्राचार्य, जिन्होंने आगम-ग्रन्थों पर भाष्य, नियुक्ति, चूणि या टीकाएँ लिखने में पर्याप्त उदारता व्यक्त की है, परन्तु सूर्य-चन्द्र सम्बन्धी प्रज्ञप्तियों पर प्रायः नहीं लिखा है। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि सीधे अध्यात्म एवं प्राचार-उपासना जैसे विषयों के प्रति उनकी रुचि विशेष रही होगी। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि इन प्रज्ञप्तियों के विषय विज्ञान के प्रतिनिकट होने से क्लिष्ट जानकर छोड़ दिये हों। उत्तरकाल में कुछ प्राचार्यों ने इस कमी को समझा और पून: इस पर टीका लिखने का उपक्रम किया। इनमें स्थानकवासी आचार्य मुनि धर्मसिंहजी (१८वीं शती) ने 'सूर्य-प्रज्ञप्ति के यन्त्र' निर्मित किये और इसी परम्परा के अन्य आचार्य श्री घासीलालजी महाराज ने 32 आगमों पर जो संस्कृत भाषा में टीकाएँ लिखी हैं उनमें सूर्य-प्रज्ञप्ति पर "प्रमेयबोधिनी" सूर्य प्रज्ञप्ति-प्रकाशिका नामक टोका व्याख्या महत्त्वपूर्ण है। इसमें प्राचार्य श्री ने मूलसूत्र की संस्कृत छाया और संस्कृत व्याख्या की है। इसका हिन्दी और गूजराती भाषा में अनुवाद दो भागों में प्रकाशित भी हया है, जिसका नियोजन पण्डित मनि श्री कन्हैयालालजी ने किया है। हिन्दी और गजराती अनुवादकर्ताओं का नामोल्लेख नहीं हया है। प्राचार्य श्री अमोलकऋषिजी ने भी प्रज्ञप्ति का हिन्दी अनुवाद किया है इसका प्रकाशन हैदराबाद से हुअा है तथा और भी कुछ विद्वान् प्राचार्यों ने इस पर विवेचन किये हैं। सूर्य-प्रज्ञप्ति के सम्बन्ध में देश-विदेश के विचारक मनीषियों ने भी बहत से अभिमत भिन्न-भिन्न लेखों में व्यक्त किये हैं। भारतीय ज्योतिष के क्षेत्र में बहुमान्य बराहमिहिर' नियुक्तिकार भद्रबाहु के भ्राता थे, उन्होंने अपने ग्रन्थ "बराहसंहिता" में सूर्य-प्रज्ञप्ति के कतिपय विषयों को आधार बनाकर उन पर लिखा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध ज्योतिविद भास्कर ने सूर्य-प्रज्ञप्ति की कुछ मान्यताओं को लेकर अपने खण्डनात्मक विचार व्यक्त किये हैं जो "सिद्धान्तशिरोमणि" ग्रन्थ में द्रष्टव्य हैं / इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त ने "स्फुट-सिद्धान्त' ग्रन्थ में भी खण्डन का आधार बनाया है / किन्तु इस युग में वैदेशिक विद्वानों ने सूर्य-प्रज्ञप्ति के महत्त्व को स्वीकार करते हुए इसे विज्ञान का प्रत्य माना है, डॉ. विन्टरनित्ज उनमें प्रथम हैं। डॉ. शुबिग ने तो यहां तक कहा है कि "सूर्य-प्रजाप्ति के अध्ययन के बिना भारतीय ज्योतिष के इतिहास को सही रूप से नहीं समझा जा सकता।" बेवर ने सन् 1868 में "उवेर डी सर्यप्रज्ञप्ति" नामक निबन्ध प्रकाशित किया था। डॉ. सिबो ने “ऑन द सूर्य-प्रज्ञप्ति' नामक अपने शोधपूर्ण लेख में ग्रीक लोगों के भारतवर्ष में प्रागमन से पूर्व वहाँ "दो सूर्य और दो चन्द्र' का सिद्धान्त सर्वमान्य था, ऐसा प्रतिपादित किया है तथा उन्होंने अतिप्राचीन ज्योतिष के वेदांग ग्रन्थ को मान्यताओं के साथ सूर्य-प्रज्ञप्ति के सिद्धान्तों की समानता भी बतलाई है / 10. प्रस्तुत प्रकाशन और कुछ प्रश्न : कुछ समाधान "सूर्य-प्रज्ञप्ति' की गरिमा से स्वत: सिद्ध हो जाता है कि ऐसे ग्रन्थ का सर्वाधिक स्वाध्याय हो, मनन हो और गम्भीरता-पूर्वक इसमें वर्णित विषयों का स्व-पर कल्याण की दृष्टि से पुन: पुन: विचार हो / सम्भवतः इसी कल्याणमयी भावना से इसका प्रकाशन किया गया है, जो कि अभिनन्दनीय है। यद्यपि यह ग्रन्थ मूल रूप में ही प्रकाशित है किन्तु इसके सम्पादनकर्ता मुनि श्री कन्हैयालालजी "कमल" ने परिश्रमपूर्वक इसके पाठों को विशुद्धरूप में प्रकाशित करने का प्रयास किया है। साथ ही पाद-टिप्पणियों में अनेक प्रश्नों को भी उठाया है तथा उनके समुचित समाधानों की कामना भी की है। मैंने जब इसका अवलोकन किया 1. द्रष्टव्य, गच्छाचार की वृत्ति. [ 37 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org