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________________ तो मेरे मन में भी कुछ प्रश्न उभर आये। उन सबका क्रमिक विचार भी यहाँ प्रस्तुत करना अनुचित न होगा। यहाँ उन प्रश्नों की उपस्थापना के साथ ही उनके यथोपलब्ध समाधान भी प्रस्तुत हैं--- प्रश्न 1. सूर्यप्रज्ञप्ति ग्रन्थ वस्तुतः खण्डित है फिर यह ग्रन्थ कैसे पूर्ण हुआ ? समाधान : ऐसा कहा जाता है कि इसके पाठों में और चन्द्रप्रज्ञप्ति के पाठों में प्रायः साम्य है। अत: पूर्वाचार्यों ने ही इसे परस्पर पाठानुसंधान द्वारा वर्तमान रूप दिया है / प्रश्न 2. वर्तमान सूर्यप्रज्ञप्ति के मूलपाठों में अब भी पाठान्तर क्यों हैं ? यह स्थिति इस संस्करण से पूर्व प्रकाशित "सूर्यप्रज्ञप्ति" ग्रन्थों से मिलाने से स्पष्टत: प्रतीत हो जाती है। जैसे प्रारम्भ में “वीरस्तुति" नहीं दी है। कहीं गद्यपाठ में कुछ अंश त्याग दिये हैं तो यत्र-तत्र पाठगत शब्दों में व्यत्यय भी हना है, आदि / समाधान : सम्भवत: यह इसलिए किया गया होगा कि सम्पादक-वर्ग को ऐसी अन्य पाण्डुलिपियां उपलब्ध हुई हों। साथ ही उपाचार्य श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्री के शब्दों में यह भी सम्भव है कि जैन आगम "शब्द" की अपेक्षा "अर्थ” को अधिक महत्त्व देते हैं। वेदों की तरह शब्दवादी नहीं हैं। अत: ऐसा पाठभेद हुआ होगा। एक यह भी कारण हो सकता है कि स्थविरों के द्वारा संग्रह होने के पश्चात् इनकी जो भिन्न-भिन्न कालों में वाचनाएँ हई हैं, उनमें वैसी व्यवस्था हुई हो। प्रश्न 3. इस ग्रन्थ में एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है नक्षत्र-भोजन में मांसादि के भोजन का? यह जैनधर्म के सर्वथा प्रतिकूल कथन इसमें कैसे पाया ? समाधान : इस सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न समाधान प्राप्त होते हैं। यथा 1. यह पाठ प्रक्षिप्त है / 2. इस पाठ से पूर्व और भी कुछ पाठ था, जो विच्छित्र हो गया है। 3. इस सम्बन्ध में प्रागमप्रभाकर पुण्यविजयजी का अभिमत था कि 'इसके पहले के कुछ वाक्य खण्डित हो गये हैं, जिनमें यह भगवान् महावीर के द्वारा कथित न होकर किसी प्रश्न के उत्तर में उद्धरण के रूप में अन्य मतों का प्रदर्शन किया गया है।' 4. अन्य प्राचार्यों का कथन है कि यहाँ प्रयुक्त "मांस" शब्द का अर्थ प्राण्या मांस नहीं है, अपिर यह अत्यन्त प्राचीनकाल में प्रयुक्त होने वाले अर्थ "वनस्पतिजनित फल, मेवा' आदि के अर्थ में व्यवहृत है। इसी प्रकार मांस के पर्यायवाची अन्य शब्द "पिशित, तरस, पलल, अव्य और आमिष" शब्द भी प्राण्यङ्गजन्य मांस के सूचक न होकर अन्य अर्थों के ही सूचक हैं। अमरकोष के टीकाकार भानुजी दीक्षित ने जो धातुप्रत्यय जनित शब्द की व्युत्पत्ति दी है, उससे "पिशित = अवयववान्, तरस - बलवान, मांस-मानकारक, पलल = गमनकारक, ऋव्य = भयकारक अथवा गतिकारक और आमिष = किंचित स्पर्धाकारक अथवा सेचन अर्थ का ही प्रतिपादन होता है / कोशकारों के अतिरिक्त प्रायुर्वेद के ग्रन्थों में भी ऐसे अनेक शब्दों को वनस्पतियों के अर्थों में ही प्रयुक्त किया है / 5. वेद, ब्राह्मण, उपनिषद् और अन्य संहिता-ग्रन्थों में भी ऐसे मांसा दि शब्दों के प्रयोग निविवादरूप से प्राण्यङ्गजनित मांस के लिए कदापि प्रयुक्त नहीं हैं। 6. तन्त्रग्रन्थों में भी यही स्थिति है। वहां ऐसे शब्दों को वस्तुतः प्राध्यात्मिक अर्थों में ही सूचित किया है किन्तु वामाचार के नाम पर जिह्वालोलुपवर्ग अपनी लिप्सायों के अनुसार अर्थ करके विकृतमार्ग का अनुसरण करते हैं। प्राचीन महर्षियों की कथन-पद्धति का वास्तविक तथ्य एवं प्रक्रिया का पारम्परिक बोध न होने से मनमाना अर्थ लगाकर समाज में दुषण फैलाने वाले अथवा पापसिद्धि के लिये दुर्वत्ति के लोग ऐसा करते हैं। 1. यह बात उपाचार्य श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्रीजी ने कही थी, जबकि उन्होंने इसके लिये स्वयं प्रागमप्रभाकरजी से पूछा था। [38] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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