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________________ बाहुल्य, उनको वहन करने वाले देवों की संख्या और उनके दिशाक्रम से रूप, शीघ्र-मन्द गति, अल्पबहुत्व, चन्द्र-सूर्य की अग्रमहिषियों का परिवार, विकुर्वणा, शक्ति एवं देव-देवियों की जघन्य उत्कृष्ट स्थिति प्रादि विषयों पर विस्तार से विचार हुआ है। उन्नीसवें प्राभत में-चन्द्र और सूर्य सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं अथवा लोक के एक विभाग को ? यह प्रश्न उठाकर इस सम्बन्ध में बारह मत-मतान्तरों का उल्लेख करते हुए स्वमत का निरूपण किया है। साथ ही लवणसमुद्र का आयाम, विष्कम्भ और चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र एवं ताराओं का वर्णन है। उसी प्रकार धातकीखण्ड के संस्थान, कालोदधिसमुद्र और पुष्करार्धद्वीप तथा मनुष्य क्षेत्र आदि का विवरण प्रस्तुत हुप्रा है। इसी प्राभत में यह भी बतलाया गया है कि इन्द्र के अभाव में व्यवस्था, इन्द्र का जघन्य और उत्कृष्ट विरहकाल, मनुष्य क्षेत्र के बाहर चन्द्र की उत्पत्ति और गति तथा अन्त में स्वयम्भूरमण समुद्र तक द्वीपसमुद्रों के मायाम, विष्कम्भ, परिधि आदि का वर्णन है। बीसवें प्राभत में चन्द्रादि का स्वरूप, राह का वर्णन, राह के दो प्रकार तथा जघन्य-उत्कृष्ट काल का वर्णन है। यहीं चन्द्र को शशि और सूर्य को प्रादित्य कहने का कारण बतलाते हुए स्पष्ट किया है कि ज्योतिष्कों के इन्द्र–चन्द्र का मृग (शश) के चिह्नवाला 'मृगाङ्क-विमान' है और सूर्य समय, आवलिका आदि से लेकर अवसपिणी-उत्सर्पिणी काल का आदि-कर्ता है। चन्द्र और सूर्य को अग्रमहिषियों और चन्द्र-सूर्य के कामभोगों की मानवीय कामभोगों के साथ तुलना भी यहाँ प्रस्तुत हुई है तथा अन्त में 88 ग्रहों के नाम बताये गये हैं। इन प्राभतों के भी अन्य लघु प्राभतों के रूप में विभाजन हैं। उपर्युक्त विषयों के अवलोकन से सहज ही यह अनुमान किया जा सकता है कि सूर्य-प्रज्ञप्ति के प्रायाम में न केवल सूर्य और उससे सम्बद्ध विषयों का ही इसमें विमर्श हमा है, अपितु समग्र ज्योतिष्क-परिवार का प्रसंगानुसार सूक्ष्म एवं स्थूल विमर्श समावृत हो गया है। इतना ही नहीं, यहाँ प्राचीन ज्योतिष-सम्बन्धी मूल का भी सङ्कलन आ गया है / इसमें चचित विषय अन्यान्य धर्मों के मान्य-ग्रन्थों में चचित विषयों से भी कुछ अंशों में साम्य रखते हैं। 9. सूर्य-प्रज्ञप्ति की नियुक्ति एवं अन्य विवेचनाएँ सूर्य-प्रज्ञप्ति के व्यापक विषय-विवेचन से प्रभावित होकर नियुक्तिकार भी भववाहु ने दस प्रागमों पर नियुक्तियों की रचना की थी, उनमें सूर्य-प्रज्ञप्ति भी थी। किन्तु दुर्भाग्य से अब वह अनुपलब्ध है। किन्तु प्राचार्य मलयगिरि की वत्ति में इसका निर्देश हुआ है। उन्होंने वहाँ लिखा है-'भद्रबाहरि कृत नियुक्ति का नाश हो जाने से मैं केवल मुल सूत्र का ही व्याख्यान करूंगा।' इसके बीच के काल में भाष्य और चणियां भी लिखी गई किन्त सर्य-प्रज्ञप्ति पर किसी ने लिखा हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। आचार्य मलयगिरि का स्थितिकाल १५वीं शती माना जाता है। इनके द्वारा लिखे गये ग्रन्थों में "सर्यप्रज्ञप्त्यपाङटीका" 9500 श्लोक प्रमाण उपलब्ध होती है / इसी का अपरनाम "सूर्यप्रज्ञप्तिव है। प्राचार्य ने यहाँ प्रारम्भ में मिथिला नगरी, मणिभद्र चैत्य, जितशत्रु राजा, धारिणी देवी और भगवान् महावीर का साहित्यिक वर्णन किया है। तदनन्तर गणधर इन्द्रभूति गौतम का वर्णन है। वैसे सूर्यप्रज्ञप्ति के बीसों प्राभतों का विवेचन मननीय है और उसमें यत्र-तत्र विशिष्ट चिन्तन, आलोचना एवं स्वमत-निरूपण को भी स्थान दिया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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