________________ को प्रकाशित करता है। इस प्रकार दो सूर्यो की सत्ता प्रतिपादित हुई है और इसी से दिन-रात्रि की व्यवस्था स्पष्ट की गई है। साथ ही भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की अपेक्षा उत्सपिणी-अवसपिणी काल का कथन भी इसी प्राभत में वर्णित है। नौवें प्राभूत में--पौरुषी छाया का प्रमाण बतलाते हुए सूर्य के उदयास्त के समय 59 पुरुष-प्रमाण छाया होती है, यह बतलाया है और इस सम्बन्ध में अनेक मत-मतान्तरों का उल्लेख करते हए स्वमतानुसार पौरुषीछाया के सम्बन्ध में स्थापना की है। दसवें प्रामृत में-नक्षत्रों में प्रावलिका क्रम, मुहूर्त की संख्या, पूर्व-पश्चिम भाग तथा उभयभागों से चन्द्र के साथ योग करने वाले नक्षत्र, यूगारम्भ में योग करने वाले नक्षत्रों का पूर्वादि विभाग, नक्षत्रों के कुल, उपकुल तथा कुलोपकुल, 12 पूर्णिमा और अमावस्याओं में दक्षत्रों के योग, समान नक्षत्रों के योग बाली पूणिमा तथा अमावस्या, नक्षत्रों के संस्थान, उनके तारे, वर्षा, हेमन्त और ग्रीष्म ऋतुओं में मासक्रम से नक्षत्रों का योग तथा पौरुषी प्रमाण, दक्षिण-उत्तर एवं उभयमार्ग से चन्द्र के साथ योग करने वाले नक्षत्र, नक्षण रहित चन्द्रमण्डल, सूर्यरहित चन्द्र मण्डल, नक्षत्रों के देवता, 30 मुहूर्तों के नाम, 15 दिन, रात्रि और तिथियों के नाम, नक्षत्रों के गोत्र, नक्षत्रों में भोजन का विधान, एक युग में चन्द्र व सूर्य के साथ नक्षत्रों का योग, एक संवत्सर के महीने और उनके लौकिक तथा लोकोत्तर नाम, पांच प्रकार के संवत्सर, उनके 5-5 भेद और अन्तिम शनैश्चर-संवत्सर के 28 भेद, दो चन्द्र, नक्षत्रों के द्वार, दो सूर्य और उनके साथ योग करने वाले नक्षत्रों के मुहूर्त परिमाण, नक्षत्रों की सीमा तथा विष्कम्भ आदि का प्रतिपादन विस्तार के साथ इसके 22 उप-अध्यायों में हुआ है। ग्यारहवें प्राभूत में--संवत्सरों के आदि, अन्त और नक्षत्रों के योग का वर्णन है। बारहवें प्राभत में-नक्षत्र, चन्द्र, ऋतु, श्रादित्य और अभिवधित 5 संवत्सरों का वर्णन, छह ऋतुओं का प्रमाण, 6-6 क्षयाधिक तिथियां, एक युग में सूर्य और चन्द्र की आवत्तियां और उस समय नक्षत्रों के योग और योगकाल प्रादि का वर्णन है। तेरहवें प्राभूत में--कृष्ण और शुक्ल पक्ष में चन्द्र की हानि-वृद्धि, 62 पूर्णिमा तथा 62 अमावस्याओं में चन्द्र-सूर्यों के साथ राहु का योग, प्रत्येक अयन में चन्द्र की मण्डल-गति आदि का वर्णन किया गया है / चोयहवें प्रामृत में कृष्ण और शुक्ल पक्ष की ज्योत्स्ना और अन्धकार का प्रमाण वर्णित है। पन्द्रहवें प्राभत में चन्द्रादि ज्योतिष्क देवों की एक मुहर्त की गति है, यह बतलाकर नक्षत्रमास में चन्द्र, सूर्य, ग्रहादि की मण्डल गति और ऋतुमास तथा आदित्यमास में भी मण्डल गति का निरूपण किया है। सोलहवें प्रामृत में-चन्द्रिका, पातप और अन्धकार के पर्यायों का वर्णन है / सत्रहवें प्रामृत में सूर्य के च्यवन तथा उपपात के सम्बन्ध में अन्य 25 मत-मतान्तरों का उल्लेख करने के पश्चात् स्वमत का संस्थापन किया है। अठारहवें प्राभूत में भूमि से सूर्य-चन्द्रादि की ऊँचाई का परिमाण बताते हुए अन्य 25 मत-मतान्तरों का उल्लेख करके स्वमत का प्रतिपादन किया है। चन्द्र-सूर्य के विमानों के नीचे, ऊपर तथा सम विभाग में ताराओं के विमान होने के कारण एक चन्द्र का ग्रह, नक्षत्र और तारानों का परिवार, भेरुपर्वत से ज्योतिष्कचक्र का अन्तर, जम्बूद्वीप में सर्व बाह्य-प्राभ्यन्तर, ऊपर-नीचे चलने वाले नक्षत्र, चन्द्र-सूर्यादि के संस्थान, पायाम, विष्कम्भ और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org