SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 36
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रथम प्राभत में-"दिन ब रात्रि में 30 मुहर्त, नक्षत्रमास, सूर्यमास, चन्द्रमास प्रौर ऋतुमास के मुहतों की वृद्धि, प्रथम से अन्तिम और अन्तिम से प्रथम मण्डल पर्यन्त सूर्य की गति के काल का प्रतिपादन एवं अन्तिम मण्डल में सूर्य की एक बार तथा शेष मण्डलों में सूर्य की दो बार गति होना, प्रादित्य-संवत्सर के दक्षिणायन और उत्तरायन में अहोरात्र के जघन्य तथा उत्कृष्ट मुहूर्त एवं अहोरात्र के मुहतों की हानिवृद्धि के कारण भरत और ऐरावत क्षेत्र के का उद्योत क्षेत्र, प्रादित्यसंवत्सर के दोनों अयनों में प्रथम से अन्तिम और अन्तिम से प्रथम पर्यन्त एक सूर्य की गति का अन्तर, अन्तर के सम्बन्ध में छह अन्य मान्यताएँ, सूर्य द्वारा द्वीपसमुद्रों के अवगाहन सम्बन्ध में एक अहोरात्र में सूर्य के परिभ्रमण का परिमाण एवं मण्डलों की रचना तथा विस्तार वणित हैं।" द्वितीय प्राभृत में--"सूर्य के उदय और अस्त का वर्णन करके अन्यतीथिकों के मतों का उल्लेख किया है, जिनमें-- 1. सूर्य का पूर्व दिशा में उदित होकर आकाश में चला जाना, 2. सूर्य को गोलाकार किरणों का समूह बतलाकर सन्ध्या में नष्ट होना, 3. सूर्य को देवता बतलाकर उसका स्वभाव से उदयास्त होना, 4. सूर्य के देव होने से उसकी सनातन स्थिति रहना, 5. प्रात: पूर्वदिशा में उदित होकर सायं पश्चिम में पहँचना तथा वहाँ से अधोलोक को प्रकाशित करते हुए नीचे की ओर लोट जाना आदि प्रमुख हैं। अन्त में “सूर्य के एक मण्डल से दूसरे मण्डल में गमन का और वह एक मुहूर्त में कितने क्षेत्र में परिभ्रमण करता है ? इसका विचार व्यक्त करते हुए स्वमत का भी प्रतिपादन हुआ है। अन्यधर्मावलम्बी पृथ्वी का आकार गोल मानते हैं किन्तु जैनधर्म की मान्यता उससे भिन्न है, यह भी इससे संकेतित है।" तृतीय प्राभूत में-चन्द्र, सूर्य द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले द्वीप एवं समुद्रों का वर्णन है। इसी प्रसंग में बारह मतान्तरों का भी निर्देश हुअा है। चतुर्थ प्राभूत में चन्द्र और सूर्य के 1. विमान संस्थान तथा 2. प्रकाशित क्षेत्र के संस्थान और उनके सम्बन्ध में 16 मतान्तरों का उल्लेख है। यहीं स्वमत से प्रत्येक मण्डल में उद्योत तथा ताप क्षेत्र का संस्थान बतलाकर अन्धकार के क्षेत्र का निरूपण किया गया है। सूर्य के ऊर्ध्व, प्रध: एवं तिर्यक ताप-क्षेत्र के परिमाण भी यहीं वणित हैं। पांचवें प्राभृत में सूर्य की लेश्याओं का वर्णन है। छठे प्राभूत में सूर्य का प्रोज वणित है अर्थात् सूर्य सदा एक रूप में अवस्थित रहता है अथवा प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है ? इस सम्बन्ध में 25 प्रतिपत्तियां हैं। जनदृष्टि से व्यक्त किया है कि जम्बूद्वीप में प्रतिवर्ष केवल 30 मुहूर्त तक सूर्य अवस्थित रहता है तथा शेष समय में अनवस्थित रहता है। क्योंकि प्रत्येक मण्डल पर एक सूर्य 30 मुहूर्त रहता है। इसमें जिस-जिस मण्डल पर वह रहता है, उस दृष्टि से वह अवस्थित है और दूसरे मण्डल की दृष्टि से वह अनवस्थित है, यह स्पष्ट किया है। __ सातवें प्राभूत में -सूर्य अपने प्रकाश से मेरुपर्वतादि को और अन्य प्रदेशों को प्रकाशित करता है, यह बतलाया है। ___ आठवें प्राभृत में—जो सूर्य पूर्व-दक्षिण में उदित होता है, वह मेरु के दक्षिण में स्थित भरतादि क्षेत्रों को प्रकाशित करता है और जो मेरु के पश्चिम-उत्तर में उदित होता है, वह मेरु के उत्तर में स्थित ऐरावतादि क्षेत्रों Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy