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________________ को सम्मिलित करने से पाचारादि ग्यारह अंगों को 'द्वादशांगी' कहा गया। प्राचारांग आदि के प्ररूपक महावीर की श्रुतराशि 'चौदह पूर्व' अथवा 'दृष्टिवाद' के नाम से पहचानी जाती थी। इसका वर्गीकरण 'अंगप्रविष्ट' और 'अंगबाह्य ऐसे दो भागों में किया गया। इनमें प्रथम 'गणधर द्वारा सूत्र रूप में निर्मित' और द्वितीय 'स्थविरकृत' समाविष्ट हैं। इनके अतिरिक्त एक और सूक्ष्म विवेचन करते हए नन्दीसूत्र में "आवश्यक, श्रावश्यक-व्यतिरिक्त, कालिक और उत्कालिक" रूप में पागम की सम्पूर्ण शाखाओं का परिचय दिया है। इनके अतिरिक्त दिगम्बर मान्यता के अनुसार "अंगप्रविष्ट" प्रागमों का एक वर्गीकरण दृष्टिवाद के 1. परिकर्म, 2. सूत्र, 3. प्रथमानुयोग, 4. पूर्वगत एवं 5. चूलिका के रूप में हुआ है / श्री पार्यरक्षित ने आगमों को अनुयोगों के अनुसार चार भागों में विभाजित किया जिनके "1. चरण-करणानुयोग, 2. धर्मकथानुयोग, 3. गणितानुयोग तथा 4. द्रव्यानुयोग" ये नाम दिये हैं। इन्हीं ने व्याख्याक्रम की दृष्टि से 1. अपृथक्त्वानुयोग और 2. पृथक्त्वानुयोग के रूप में आगमों के दो रूप भी बतलाये / इन सबके अतिरिक्त नन्दीसूत्र की चूणि में एक दृष्टि और उद्घाटित हुई जिसमें द्वादशांगी को "श्रत पुरूष" के अंगों की संज्ञा से अभिहित किया गया। साथ हो द्वादश उपांगों का भी विनियोग हुया और प्रत्येक अंग के साथ एक-एक उपांग (अंगों में कहे गये अर्थों का स्पष्ट बोध कराने वाले सूत्र) भी निर्धारित हुए। इन और ऐसे ही अन्य भेदों में श्रुतस्थविर-विरचित "सूर्य-प्रज्ञप्ति' सूत्र क्रमश: अंग, दृष्टिवाद, अंगबाह्य, प्रावश्यक व्यतिरिक्त में उत्कालिक, दृष्टिवाद का प्रथम भेद परिकर्म, गणितानुयोग, पृथक्त्वानुयोग और श्रुतपुरुष के ज्ञाताधर्मकथांग के उपांग में अपना स्थान रखती है। बत्तीस प्रागमों के क्रम में यह उपांगगत २२वीं संख्या पर है। कुछ ग्रन्थों में इसे पांचवां और कहीं छठा उपांग बतलाया गया है। 8. सूर्य-प्रज्ञप्ति का स्वरूपात्मक परिचय जैन-पागम वाङमय में "सूर्य और ज्योतिष्कचक्र" का व्यवस्थित दिग्दर्शन कराने वाला यह उपांग ग्रन्थ मुख्यतः ज्ञान एवं विज्ञान की संक्लिष्ट पद्धति से विचारों को व्यक्त करता है। गणित और ज्योतिष की महत्त्वपूर्ण विवेचना इसमें अपना विशिष्ट स्थान रखती है। इसकी रचना में 108 गद्य-सूत्र और 103 पञ्च-गाथाएं प्रयुक्त हैं। इसमें एक अध्ययन, 20 प्राभत और उपलब्ध मूलपाठ 2200 श्लोक परिमाण है। "सूर्य-प्रज्ञप्ति" अति प्राचीन ग्रन्थ है, क्योंकि इसका उल्लेख श्वेताम्बर, दिगम्बर और स्थानकवासी- तीनों में मान्य रहा है / इसी दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि इसकी स्थिति तीनों के विभाजन से पूर्व थी। इसका समय विक्रम पूर्व का होना चाहिये / विषय-विस्तार की दृष्टि से इसके 20 प्राभृतों में खगोलशास्त्र की जितनी सूक्ष्म विचारणाएँ प्रस्तुत हुई हैं, उतनी अन्यत्र कहीं एक साथ प्रस्तुत नहीं हुई हैं। इसका उपक्रम मिथिला नगरी में जितशत्रु के राज्य में नगर से बाहर मणिभद्र चैत्य में वर्धमान महावीर के पधारने पर धर्मोपदेश के पश्चात् गणधर गौतम की जिज्ञासा के समाधान हेतु हुमा है। इसमें---"मण्डलग तिसंख्या, सूर्य का तिर्यक् परिभ्रमण, प्रकाश्य क्षेत्र परिमाण, प्रकाश संस्थान, लेश्या प्रतिघात, प्रोजःसंस्थिति, सूर्यावरक उदयसंस्थिति, पौरुषी छायाप्रमाण, योगस्वरूप, संवत्सरों के आदि और अन्त, संवत्सर के भेद, चन्द्र की वृद्धि अपवृद्धि, ज्योत्स्नाप्रमाण, शीघ्रगति निर्णय, ज्योत्स्ना लक्षण, च्यवन और उपपात, चन्द्र सूर्य प्रादि की ऊंचाई, उनका परिमाण एवं चन्द्रादि के अनुभाब आदि विषयों की विस्तृत चर्चा है। अत: यह ग्रन्थ खगोलशास्त्र के चिन्तकों के लिये पर्याप्त उपयोगी तथ्य उपस्थापित करता है। उपाचार्य श्री देवेन्द्र मुनि शास्त्री ने अपने महनीय ग्रन्थ "जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा" में सूर्य-प्रज्ञप्ति का विस्तृत परिचय देते हुए लिखा है। सारांश इस प्रकार है जन [ 33] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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