________________ 2. चतुरस्र इष्टकाकार 3. चन्द्र विमान 26 योजन (लम्बाई-चौड़ाई) 4. चन्द्र विमान की ऊँचाई 16 योजन 5. सूर्य विमान योजन (लम्बाई-चौड़ाई) 6. सूर्य विमान की ऊंचाई 14 योजन। जम्बूद्वीप में एक चन्द्र, एक सूर्य 48 घण्टे में प्रत्येक मण्डल को पूर्ण करता है / जम्बूद्वीप में एक सूर्य दक्षिण दिशा में भरतक्षेत्र में होता है तब दूसरा सूर्य उत्तरदिशा में-ऐरवत क्षेत्र में रहता है। उसी समय एक चन्द्र पूर्व महाविदेह में होता है तब दूसरा चन्द्र पश्चिम महाविदेह में रहता है। जहाँ सूर्य होता है वहाँ दिन और जहाँ चन्द्र होता है वहाँ रात्रि होती है। अतः प्रत्येक क्षेत्र में जो सूर्य-चन्द्र प्राज दिखाई देते हैं, वे दूसरे दिन नहीं दिखाई देते / इस प्रकार सूर्य-चन्द्र का परिभ्रमण सतत चाल है। अढाई द्वीपवर्ती सभी सूर्य-चन्द्र द्वीपवर्ती मेरुपर्वतों के चारों ओर सतत परिभ्रमण कर रहे हैं / इस प्रकार कुल 132 सूर्य-चन्द्र अढाई द्वीपों के मध्यस्थ मेरु की परिक्रमा कर रहे हैं, वे दो विभाग में विभक्त 66-66 संख्या में रहते हैं और इनकी पंक्ति सदा एक साथ ही परिक्रमा करती है। सूर्य परिभ्रमण करते हुए जैसे-जैसे आगे बढ़ता है वैसे उस क्षेत्र में सूर्योदय कहलाता है और वह गति करता हुमा पिछले क्षेत्र में अन्तिम दिखाई देता है तब सूर्यास्त कहलाता है। वस्तुत: जैन आगमों में वर्णित सूर्य-चन्द्रादि ज्योतिष्क देवों की विचारणा इतनी महत्त्वपूर्ण एवं सूक्ष्मता से परिपूर्ण है कि उसका वर्णन करना यहाँ सम्भव नहीं है। भगवतीसूत्र, जीवाभिगम, सूर्य-प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, ज्योतिष्करण्डक, क्षेत्रलोकप्रकाश, बृहत्संग्रहणी, क्षेत्रसमास (लघु एवं बृहत्) तथा त्रिलोकसारादि में यह विषय विस्तार से समझाया गया है। इतना ही नहीं, अन्य धर्मों के प्रमुख अन्थों में भी सूर्य की सर्वोपरि सत्ता को बहुत ही प्रादर के साथ सराहा गया है / वेदों में सूर्य को "प्राणः प्रजानामुख्यत्येष सूर्यः, विभ्राट्, बृहतू, विश्वाय वृशे सूर्यम्, सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च," और "आकृष्णन रजसा वर्तमानो निवेशयनमृतं मर्त्यश्च / हिरण्ययेन सविता रथन देवो याति भुवनानि पश्यन" इत्यादि अनेक मन्त्रों से विविधरूप में व्यक्त किया है / सर्वाराध्य गायत्री मन्त्र में भी सवित देवता की ही महिमा और प्रार्थना है। सूर्य के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अनेक विवेचन वैदिक मन्त्रों में अभिव्यक्त हैं, जिनके भाष्यों में प्राचार्यों ने सूक्ष्मातिसूक्ष्म परीक्षणात्मक प्रयोगों के निर्देश भी दिये हैं। सूर्य सप्ताश्वरथ में स्थित होकर जगत् को प्रकाशित करता है। ऋग्वेद में "सप्त यूञ्जन्ति रथमेकचक्र" कहते हुए जगत् को सप्तवर्गी ही बतलाया है। ये सात वर्ग-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, दिक् और काल हैं / सौर-परिवार के नौ सदस्य नवग्रह हैं / सूर्य प्रादि ग्रहों के बिम्बों का व्यास, गति, युति, ग्रहण प्रादि के वर्णन पुराणों तथा ज्योतिष के ग्रन्थों में व्यापकरूप से आये हैं। "वद्ध गर्गसंहिता" में "महासलिलाध्याय" के उत्तरार्ध में "ग्रहकोपाध्याय, नक्षत्रकर्मगणाध्याय" आदि में वैज्ञानिक विषयों का विस्तृत वर्णन भी दर्शनीय है। इस प्रकार सूर्य की प्रखण्ड सत्ता सनातन धर्मग्रन्थों में भी विस्तार से स्वीकृत है। ऐसी ही सूर्य की सार्वत्रिक महिमा को वैज्ञानिक दृष्टि से समन्वित चिन्तन-प्रधान असाधारण विवेचना के द्वारा व्यक्त करने वाला एक महान् ग्रन्थ "सूर्य-प्रज्ञप्ति" है / जिसका परिचय इस प्रकार है७. सूर्य-प्रज्ञप्ति का आगम साहित्य में स्थान जैन आगम-साहित्य प्राचीनतम वर्गीकरण के अनुसार 'पूर्व' और 'अंग' के रूप में वर्गीकृत हुआ था जिसे श्रमण भगवान् महावीर से पूर्ववर्ती बतलाया है / इसके पश्चात् 'पूर्वश्रुत' को सरल रूप में प्रथित कर उसमें 'दृष्टिवाद' जन [ 32] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org