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________________ सक्रियता को समयमर्यादा निश्चित करने का एक मात्र आधार काल-द्रव्य है। सामान्यतः जगत् में "काल" नामक कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है तथापि उपर्युक्त जड़ और चेतन पदार्थ के सम्बन्ध में अत्यन्त उपकारक होने से शास्त्र. कारों ने इसको औपचारिक द्रव्य भी कहा है। काल का अर्थ यहाँ समय (सेकिंड, मिनिट, घण्टे, दिन, पक्ष, मास और वर्ष आदि) का सूचक है। इस समय को यदि कोई भी निश्चित कर देने वाले साधन हैं, तो वे हैं "सूर्य अनन्तज्ञानी तीर्थकर परमात्मा ने सूर्य-चन्द्र दोनों ही असंख्य कहे हैं और इनमें परस्पर तनिक भी न्यूनाधिकता नहीं है। वस्तुत: ये चार प्रकार के देवों में "ज्योतिषी देव" हैं। इनके विमानों में जटित विशिष्ट रलों के प्रकाश से जगत् के सर्व पदार्थ प्रकाशित होते हैं / सूर्यविमान के रत्नों में वर्तमान एकेन्द्रिय जीवों को प्रातप नामकर्म से उष्ण प्रकाश का अनुभव होता है और चन्द्र विमान के रत्नों में वर्तमान एकेन्द्रिय जीवों को उद्योत नामकर्म से शीत प्रकाश का अनुभव होता है। असंख्य सूर्य ज्योतिषी-निकाय के इन्द्र हैं और इन असंख्य सूर्य इन्द्रों के रहने के विमान भिन्न-भिन्न होते हैं। उसी प्रकार चन्द्रों के भी विमान भिन्न-भिन्न हैं / सूर्य का प्रत्येक विमान पूर्वदिशा में 4000 सिंह रूप, दक्षिण में 4000 हस्ति रूप, पश्चिम में 4000 वृषभ रूप तथा उत्तर में 4000 अश्व रूप इस प्रकार कूल 16000 प्राभियोगिक (सेवकादि) देव इन विमानों का वहन करते हैं। सूर्य के विमान पृथ्वी से 800 योजन ऊँचे हैं तथा वे शाश्वत हैं। शाश्वत पदार्थों का 1 योजन 3600 मील जितना होता है। जम्बूद्वीप और उसके बाद वाले असंख्य द्वीप-समुद्रों में सूर्य-चन्द्र सदा हर समय प्रकाश फैला रहे हैं / यथा-- - जम्बूद्वीप में लवणसमुद्र में धातकीखण्ड में कालोदधिसमुद्र में अर्ध-पुष्करद्वीप में 2 सूर्य 4 सूर्य 12 सूर्य 42 सूर्य 72 सूर्य 2 चन्द्र 4 चन्द्र 12 चन्द्र 42 चन्द्र 72 चन्द्र 132 चन्द्र 132 सूर्य इन सूर्य-चन्द्रों के सम्बन्ध में अन्य ज्ञातव्य इस प्रकार है मनुष्यलोक के सूर्य-चन्द्र 1. अस्थिर (परिभ्रमणशील) 2. इनके विमान की पीठिका अर्ध कोष्ठकाकार 3. चन्द्र विमानयोजन (लम्बाई-चौड़ाई) 4. चन्द्र विमान की ऊँचाई योजन 5. सूर्य विमान 6 योजन (लम्बाई-चौड़ाई) 6. सूर्य विमान की ऊँचाई योजन / मनुष्यलोक से बाहर के सूर्य-चन्द्र 1. स्थिर (परिभ्रमणरहित) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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