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________________ एक रज्जुलोक कहलाता है। चौदह रज्जुलोक का आकार दोनों पैर सीधे करके कटि के दोनों पाश्वों पर हाथ रखकर खड़े हुए पुरुष के समान है। प्रागम साहित्य में इसे लोक पुरुष की संज्ञा दी गई है। इसी में धर्मास्तिकायादि (काल द्रव्य, सहित) छह द्रव्य हैं। लोक के बाहर जो अाकाशा स्तिकाय है, उसमें इन छह द्रव्यों के न होने से उसे "अलोक" कहते हैं। प्रलोक का विस्तार लोक की अपेक्षा अनन्त गुना विशाल है। लोक के "ऊर्ध्व", "अधः" और "तिर्यक" ऐसे तीन विभाग हैं। इनमें "रत्नप्रभा" से नौ सौ योजन ऊपर तथा नौ सौ योजन नीचे इस प्रकार कुल अठारह सौ योजन मोटाई वाला, एक रज्जु चौड़ा ऐसा "तिर्यक् लोक" है। वहां से नौ सौ योजन न्यून सात रज्जु प्रमाण “अधोलोक" है और "ऊर्ध्वलोक" भी नौ सौ योजन न्यून सात रज्जु प्रमाण है / / संक्षेप में यह लोक का सामन्य परिचय है। विशेष ज्ञान के लिये गणितानयोग का आद्योपान्त अवलोकन "लोक-प्रकाश", क्षेत्रसमास आदि दर्शनीय हैं। 6. सूर्य का आलोक और उसका स्वरूप तिर्यकलोक में जो प्रकाश व्याप्त है, वह सूर्यों के द्वारा ही प्राप्त है। मनुष्यलोक के अन्दर और बाहर के विभागों को प्रकाशित करने वाले सूर्य पृथक्-पृथक् हैं और इस दृष्टि से सूर्यों की अनेकता सिद्ध है। इस मध्यलोक के प्रकाशक सूर्य और इनके सहयोगी अन्य देव, जो कि "ज्योतिष्क देव" के रूप में पहचाने जाते हैं-इन सबका परिचय प्रागमों में इस प्रकार है-- जम्बद्वीप के मध्य में स्थित "मेरुपर्वत की समतल भूमि से ऊपर 790 योजन की ऊँचाई के पश्चात् ज्योतिश्चक्र का क्षेत्र प्रारम्भ होता है जो कि 110 योजन प्रमाण है अर्थात् ज्योतिश्चक्र की स्थिति इसी मध्यलोक में है। इन 110 योजनों में से 10 योजन छोड़कर उसके ऊपर मेरु की समतल भूमि से 800 योजन की ऊँचाई पर सूर्य के विमान हैं। उससे 80 योजन की ऊँचाई पर चन्द्र के विमान हैं / वहाँ से 20 योजन तक अर्थात् मेरु की समतल भूमि से 900 योजन की ऊंचाई तक की परिधि में ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्ण तारागण हैं / तारासमूह को प्रकीर्ण कहने का कारण यह है कि अन्य कतिपय तारे अनियतचारी होने से कभी सूर्य और चन्द्र के नीचे भी चलते हैं तथा कभी ऊपर भी। इन सब ज्योतिष्कों की स्थिति भी इसी मध्यलोक में है। मनुष्यलोक की सीमा में जो ज्योतिष्क हैं वे भ्रमण करते रहते हैं। इसलिये उन्हें "चर ज्योतिष्क" कहते हैं। चर ज्योतिष्कों की गति की अपेक्षा से ही मुहर्त, प्रहर, अहोरात्र, पक्ष, मास, अतीत, वर्तमान आदि तथा संख्येय-असंख्येय प्रादि काल का व्यवहार है। मनुष्यलोक की सीमा से बाहर ज्योतिष्कों के विमान स्थिर हैं। स्वभावत: वे एक स्थान पर स्थिर रहते हैं, भ्रमण नहीं करते / अतः उनका उदय-अस्त न होने से उनका प्रकाश भी एक समान पीतवर्णी और लक्ष योजन-प्रमाण रहता है। इसलिये उन्हें "स्थिर ज्योतिष्क" कहा है / सभी ज्योतिष्क पांच यूथों में विभाजित होते हैं और वे सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र और तारामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। केवल मनुष्य सृष्टि के लिये ही ये सतत गतिशील रहते हैं ऐसा प्रतीत होता है, यहाँ सूर्य-चन्द्र की बहलता के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण जैन सिद्धान्त की लाक्षणिकता के लिये आवश्यक है। मुख्यत: जम्बूद्वीप (मध्यलोक) में दो सूर्य, दो चन्द्रों का होना माना जाता है / समय विभाजन इन ज्योतिर्मय देवों की गति से ही निर्धारित होता है। जैनदर्शन की दृष्टि से जगत् में व्याप्त दृष्ट-अदृष्ट सभी पदार्थ जिन षड् द्रव्यों में विभक्त हैं उनमें "काल" को भी एक द्रव्य माना है। चेतन और जड़ पुद्गल तीनों कालों में सक्रिय रहते हैं। जीव तथा पुद्गल को [30] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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