________________ 5. 13 शतक, 4 उद्देशक / ' तथा अन्य सूत्रों में प्रासंगिक रूप से चचित विषयों का अध्ययन किया जाये तथा 2. लोक के आकार-ज्ञान के लिये-- 1. आचारांगसूत्र श्रुत 1. अ. 8, उ. / 2 / द्रष्टव्य हैं। लोक-विषयक विचारणा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। जैन आगमों में लोक का अभिप्रेतार्थ "रज्जुलोक" है, क्योंकि यह चौदह विभागों में विभाजित है, अतः इसे "चौदह रज्जूलोक" के नाम से भी पहचाना जाता है। वैसे वैदिक-धर्मग्रन्थों में भी "चौदह रज्जलोक" की मान्यता एवं वर्णन मिलते हैं। एक रज्जुलोक का प्रमाण-"कोई देव एक हजार भार वाले लोहे के गोले को अपनी समग्र शक्तिपूर्वक आकाश से फेंके और वह लोहगोलक 6 माह, 6 दिन, 6 घड़ी, 6 पल में जितना क्षेत्र लांघ जाए, उतना क्षेत्र उ. गोयमा! असंखेज्जइविहे पण्णते, तं जहा–जंबुद्दीवतिरियलोयखेत्त लोए जाव सयंभुरमणसमुद्दतिरियलोयसेत्तलोए / प्र. उड्ढलोयखेत्तलोए णं भंते ! कइविहे पणते ? उ. गोयमा ! पण्णरसविहे पण्णते, तं जहा- सोहम्मकप्पउड्ढलोयखेत्तलोए जाव अच्च्यउड्ढलोयखेत्तलोए / गेवेज्जविमाणउड्ढलोयखेत्त लोए अणुत्तरविमाणउड्डलोयखेत्तलोए इसिपब्भारपुढविउड्ढलोयखेत्तलोए।। –विया. स. 11, उ. 10, सु. 2-6 प. कहि णं भंते ! लोगस्स पायाममज्झे पण्णते ? उ. गोयमा! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए प्रोवासंतरस्स असंखेजइभागं एत्थ णं लोगस्स पायाममज्झे पण्णत्ते / प. कहि णं भंते ! अहेलोगस्स प्रायाममझ पण्णते ? गोयमा! चउत्थीए पंकप्पभाए पुढवीए प्रोवासंतरस्स साइरेग अद्ध योगाहित्ता, एत्थ णं अहेलोगस्स आयाममझे पण्णत्ते।। प. कहि णं भंते ! उड्ढलोगस्स आयाममज्झे पण्णते ? उ. गोयमा ! उप्पिं सणकुमार-माहिदाणं कप्पाणं हेदिष्ठं वंभलोए कप्पे रिटठे विमाणपत्थडे, एत्थ णं उड्ढ लोगस आयाममज्झे पण्णत्ते / 5. कहि णं भंते ! तिरियलोगस्स पायाममज्झे पण्णत्ते ? गोयमा ! जम्बुद्दीवे दीवे मंदरस्स पब्वयस्स बहमज्भदेसभाए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उवरिमहेट्टि लेसु खुड्डुगपयरेसु, एत्थ णं तिरियलोयमझ अट्रपएसिए रुयए पण्णत्ते, जो गं इमामो दस दिसाओ पवहंति, तं जहा-पुरस्थिमा पुरस्थिमदाहिणा एवं जहा दसमसते जाव नामधेज्ज त्ति / -विया. स. 13, उ. 4, सु. 10-15 2. मत्थि लोए, गस्थि लोए, धुवे लोए, प्रधुवे लोए, सादिए लोए, प्रणादिए लोए, सपज्जवसिए लोए, अपज्जवसिए लोए, सुकडे ति वा दुकडे ति वा कल्लाणे ति वा पावए ति वा साधु ति वा असाधू ति वा सिद्धी ति वा प्रसिद्धी ति वा निरए ति वा अनिरए ति वा। --आधा. श्रु. 1, अ.८, उ. 1, सु. 200 [ 29 ] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org