________________ जया लोगमलोगं च जिणो जाणइ केवली। तया जोगे निरु भित्ता सेलेसिं पडिवज्जई // 46 / / जया जोगे निरु भित्ता सेलेसि पडिबज्जइ। तया कम्म खविताणं सिद्धि गच्छइ नीरो / / 47 / / जया कम्म खवित्ताणं सिद्धि गच्छइ नीरो / तया लोगमस्थ यस्थो सिद्धो भवइ सासयो / / 4 / / -दस. अ. 4, गा. 35-48 इन्हीं सब कारणों से लोक-सम्बन्धी ज्ञान प्रत्यावश्यक माना गया है और इस ज्ञान की उपलब्धि के लिए आगम-साहित्य सदैव परिशीलनीय माना गया है / 5. लोक और उसमें "सूर्य" जैसा कि ऊपर बताया गया है कि “लोक-विज्ञान" का निदर्शन जैन-पागमों में विस्तार से हुआ है। वहाँ उसका परिचय // 1. समग्र, 2. विभिन्न अंग और 3. अंग-विशेष" के रूप में निर्दिष्ट होकर उत्तरकाल के आचार्यों द्वारा भाष्य, टीका-नियुक्ति, चुर्णी, वत्ति प्रादि के रूप में उसे और भी पल्लवित एवं पुष्पित किया गया है / ऐसे साहित्य में लोक परिचय के लिए 1. आचारांग सूत्र 1 श्रुतस्कन्ध, 2 अध्ययन, 1 उद्देशक' / 2. स्थानांग सूत्र, 1 स्थान / 3. समवायांग सूत्र-प्रथम समवायः / 4. भगवतीसूत्र 11 शतक, 10 उद्देशक / 1. इच्चत्थं गढिए लोए वसे पमत्ते अहो य राम्रो य परितप्पमाणे कालाकालसमुट्ठायी संजोगट्टी अट्टालोभी पालुपे सहसक्कारे विणिविट्ठचित्ते एत्थ सत्थे पुणो पुणो / -प्राचा. श्रु. 1, प्र. 2, उ. 1, सु. 63 2. ठाणं. अ. 1, सु. 5 3. सम. अ. 1, सु. 3 4. प्र. कइविहे गं भंते 1. लोए पण्णत्ते ? उ. गोयमा ! चउब्बिहे लोए पण्णत्ते, तं जहा.--१. दव्वलोए, 2. खेत्तलोए, 3. काललोए, 4. भावलोए / प्र. खेत्तलोए णं भंते ! कइविहे पण्णत्ते ? उ. गोयमा ! तिविहे पणत्ते, तं जहा--१. अहेलोयखेत्तलोए, 2. तिरियलोयखेत्तलोए, 3. उड्ढलोयखेत्तलोए। प्र. आहेलोयखेत्तलोए णं भंते ! कइविहे पण्णते? उ. गोयमा ! सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा–रयणप्पभापुढविहेलोयखेत्तलोए जाव अहेसत्तमपुढविअहेलोयखेत्तलोए / प्र. तिरियलोयखेत्तलोए णं भंते ! कइबिहे पण्णते ? [शेष अगले पृष्ठ पर] [28] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org