________________ 'एयंसि णं एमहालयंसि लोगंसि नरिथ के परमाणपोग्गलमत्ते वि पएसे जत्थ णं अयं जीवे गं जाए बा न मए वा वि।" -विया. स. 12, उ. 7, सु. 3/1-2. अर्थात इस लोक का ऐसा कोई प्रदेश नहीं है, जहाँ अनेक बार जीव उत्पन्न हुआ और मरा नहीं। जिस लोक में मानव उत्पन्न हुया है, उसके स्वरूप-परिज्ञान से वह सोचने लगता है कि "इस लोक के प्रत्येक प्रदेश में मेरे अनन्तबार जन्म और मरण हुए हैं, अतः इस पुनः पुनः जन्म-मरण के चक्र से मुझे मुक्त होना चाहिए।" उसकी यह जागरूकता उसे विभिन्न पुण्य-पाप, सत्कर्म-दुष्कर्म आदि से परिचित कराती है और वह उनके स्वरूपों से परिचित होकर असत्कर्मों से निवृत्ति एवं सत्कर्मप्रवृत्तिपूर्वक अपने निरापद गन्तव्य का निर्धारण करने में तत्पर हो जाता है। यदि समस्त लोक तथा पृथ्वी पर स्थित द्वीपादि का निरूपण शास्त्रों में नहीं होता तो जीव अपने स्वरूप के परिचय से अपरिचित ही रह जाता और वैसी स्थिति में आत्मज्ञान के प्रति श्रद्धान तथा ज्ञानादि की सम्भावनाएँ भी विलुप्त हो जाती। जो जीवे वि न याणाति अजीव विनयाणति / जीवाऽजीवे प्रयाणतो कहं सो नाहीइ संजमं / / 35 / / जो जीवे वि बियाणाति अजीवे वि वियाणति / जीवाजी वियाणंतो सो हुनाहीइ संजमं / / 36 / / जया जीवमजीवे य दो वि एए वियाणई / तया गई बहुविहं सव्वजोवाणं जाणई // 37 // तया गई बहुविहं सव्वजीवाण जाणई / तया पुण्णं च पावं च बंधं भोक्खं च जाणई / / 38 // जया पुण्णं च पावं च बंधं मोक्खं च जाणई। तया निविदए भोए जे दिव्वे जे य माणुसे // 39 // जया निविदए भोए जे दिव्वे जे य माणसे / / तया चयई संजोगं माब्मितरबाहिरं // 40 // जया चयइ संजोगं सऽभितर-बाहिरं / तया मुंडे भवित्ताणं पब्वइए अणगारियं // 41 // जया मुंडे भवित्ताणं पव्वइए अणगारियं / तया संवरमुक्किट्ठ धम्म फासे अणुत्तरं // 42 / / जया संवरमूक्किटठं धम्म फासे अणत्तरं / तया धुणइ कम्मरयं प्रबोहिकलुसं कडं / / 43 / / जया धुणइ कम्मरयं प्रबोहिकलुसं कडं / तया सव्वत्तगं नाणं दंसणं चाभिगच्छई // 44 / / जया सव्वत्तमं नाणं दसणं चाभिगच्छई। तया लोगमलोगं च जिणो जाणइ केवली॥ 45 // [27] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org