________________ ज्ञान करने का आग्रह किया है। वस्तुतः आन्तरिक-सत्ता के ज्ञान के साथ बाह्य-सत्ता का ज्ञान भी प्रावश्यक माना गया है। इसीलिये जैन और अन्यान्य सभी धर्मानुयायियों के प्रमाणभूत प्रागमादि ग्रन्थों में "सृष्टि-विज्ञान" को धर्मचर्चा के रूप में प्रस्तुत करते हुए मान्यता दी गई है। साथ ही इस विज्ञान को सर्वज्ञ जिनेश्वर-प्ररूपित होने के कारण इसे मोक्ष के प्रमुख साधनभूत धर्म के चार भेदों के अन्तर्गत "धर्मध्यान" नामक भेद में लोक के स्वभाव और प्राकार एवं उसमें स्थित विविध द्वीपादि, क्षेत्र तथा समुद्रादि के स्वरूप-चिन्तन में मनोयोग "संस्थानविचय" नामक धर्मध्यान होता है—ऐसा कहा गया है। इस प्रकार की लोक-भावना करते हुए प्रात्मा "संस्थानविचय" नामक धर्मध्यान में पहुंचने से अपने कर्मों का नाश कर शुक्लध्यान में पहुँचता है और क्षपकश्रेणी में आ जाने से अष्टकर्मक्षय करके अपनी प्रात्मा को शाश्वत सुख का भागी बनाता है। ऐसे अनेक तथ्यों के कारण ही लोक की "स्थिति और विस्तार" आदि की मीमांसा जैन आगमों में पर्याप्त विस्तार से हई है, उसके मूल में धर्मबोध की ही प्रधानता रही है और इसीलिए धार्मिक चर्चाओं में सर्वत्र लोकविज्ञान, लोकचिन्तन" को भी महत्त्व मिला है। ऐसी एक यावश्यक चर्या का आध्यात्मिक महत्त्व सर्वोपरि है और वह हैप्र. एयंसिणं भंते ! एमहालयंसि लोगसि अस्थि केइ परमाणुपोग्गलत्ते वि पएसे जत्थ णं अयं जीवे न जाए वा, न मए वा वि? उ. नो इणठे समझें / प्र. से केणठेणं भंते ! एवं वुच्चइ "एयंसिणं एमहालयंसि लोग सि नस्थि केई परमाणपोग्गलमेत्ते वि पएसे जत्थ णं अयं जीवे ण जाए वा न मए वा वि?" उ. गोयमा ! से जहानामए केइ पुरिसे प्रयासहस्सस्स एग महं अयावयं करेज्जा, सेणं तत्थ जहण्णणं एक्कं वा दो वा तिणि वा, उक्कोसेणं प्रयासहस्सं पक्खिवेज्जा, तानो णं तत्थ पउरगोयरात्रो पउरपाणियाओ, जहणणं एगाहं वा, या बा, तियाहं वा, उक्कोसेणं छम्मासे परिवसेज्जा / अत्थि गं गोयमा ! तस्स प्रयावयस्स के यि परमाणपोग्गलमेत्ते वि पएसे जे णं तासि प्रयाणं उच्चारण वा पासबणेण वा खेलेण वा सिंघाणएण वा वंतेण वा पित्तेण वा पूरण वा सुक्केण वा सोणिएण वा चम्मे हि वा रोमेहि वा सिंगेहि वा खुरेहि वा नहेहिं वा अणोक्कंतपुव्वे भवइ ? उ. णो इणठे समझें। होज्जा बिणं गोयमा! तस्स अयावयस्स केयि परमाणपोग्गलमेत्ते वि पएसे जे ण तासि अयाण उच्चारण वा जाव नहेहिं वा अगोक्कतपुब्बे नो चेव णं एयंसि एमहालयंसि लोगंसि लोगस्स य सासयभावं, संसारस्स य प्रणादिभावं, जीबस्स य निच्चभावं कम्मबहुत्तं जम्मण-मरणाबाहल्लं च पड़च्च नत्थि केयि परमाणपोग्गलमत्त वि पएसे- “जत्थ णं अयं जीवे न जाए वा, न मए वा वि।" से तेणठेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ---- 1. ज्ञानार्णव 34/4-8 तथा हैमयोगशास्त्र 7/10-12. [26] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org