________________ 212] [सूर्यप्रशप्तिसूत्र प्रथम 6 मास में दिवस घटता है और रात्रि बढ़ती है। दूसरे 6 मास में दिवस बढ़ता है और रात्रि घटती है। हानि-वृद्धि का प्रमाण मुहूर्त के 2/61 भाग जितना होता है। -सूत्र 11 प्रथम प्राभूत का प्रथम प्राभूत-प्राभृत समाप्त तृतीय प्राभुत-प्राभूत में 'सयमेगं चोयाले' गाथा अपूर्ण होने से अर्थ नहीं कर सकते हैं। शेष व्यवच्छेद है / इस प्रकार श्री अमोलक ऋषिजी ने सूर्यप्रज्ञप्ति की भाषा में लिखा है तथा टीकाकार मलयगिरिकृत टीका से भी यथार्थ गणित 144 आता नहीं है। जिनके ध्यान में गणित की प्रक्रिया हो यदि वे बताने की कृपा करेंगे तो श्रुतसेवा मानी जायेगी। प्रथम प्राभूत का तृतीय प्राभृत-प्राभूत समाप्त / सूत्र 15 दो सूर्यों के ( भरत और ऐरवत के ) संचरण समय में परस्पर अन्तर ___ संचरण करते समय दोनों सूर्यों के बीच प्रत्येक मंडल में 5 योजन 35/61 भाग अन्तर होता है / जब दोनों सूर्य सर्वाभ्यन्तरमंडल में वर्तमान हों तब दोनों सूर्यों के बीच 99640 योजन अन्तर होता है। ___ जम्बूद्वीप क्षेत्र एक लाख योजन के विष्कम्भ वाला है / प्रत्येक सूर्य 180 योजन अवगाहन करके संचार करता है। 100000 योजन में से दोनों सूर्य का अवगाहन क्षेत्र 180 और 180 योजन कुल मिलाकर 360 योजन कम करने पर 99640 योजन शेष रहते हैं। जो सर्वाभ्यन्तरमंडल में वर्तमान दोनों सूर्यों का अन्तर होता है / 184 सूर्यमंडल के 183 अन्तर होते हैं और एक मंडल का दूसरे मंडल तक 2 योजन 48/61 भाग का अन्तर होता है / अतः जब सूर्य एक मंडल से दूसरे मंडल में जाता है तब दोनों ओर के मंडल के अन्तर 2 योजन 48/61 और 2 योजन 48/67 का जोड़ करने पर 5 योजन 35/61 भाग होता है। सर्वबाह्यमंडल में वर्तमान दोनों सूर्यों का परस्पर अन्तर दोनों सूर्यों की अपेक्षा प्रतिमंडल 5 योजन 35/61 भाग अन्तर पूर्व में बताया है / सर्वआभ्यन्तर मंडल से सर्वबाह्यमंडल 183 वां होता है / 183 को 5 योजन 35/61 से गुणा करने पर 3 4 340 इस प्रकार 1020 योजन अन्तर आता है। इस 1020 योजन अन्तरको 996/40 में मिलाने पर 100660 योजन होता है। जो सर्वबाह्यमंडल में वर्तमान दो सूर्यों का परस्पर अन्तर है। -सूत्र 15 प्रथम प्राभृत का चौथा प्राभृत-प्राभृत समाप्त / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org