________________ उवासंहारो 107. इइ एस पाहुडत्था, अभन्वजणहिययदुल्लाहा इणभो / उक्कित्तिया भगवई, जोइसरायस्स पण्णत्ती / / एस गहियाऽवि संता, थद्धे गारबिय माणि-पडिणीए / अबहुस्सए ण देया, तस्विवरीए भवे देया / / सद्धा-धिति-उट्ठाणच्छहह-कम्म-बल-विरिय-पुरिसकारेहि / जो सिक्खिओऽधि संतो, अभायणे पक्खिबेज्जाहि // सो पवयण-कूल-गण-संघबाहिरो णाण-विणय-परिहीणो। प्ररहंत-थेर-गणहरमेरं किर होइ वोलीणो॥ तम्हा धितिउट्ठाणुच्छाह कम्म-बल-विरियसिक्खिरं गाणं / धारेयव्वं णियमा ण य अविणएसु दायव्वं // वीरवरस्स भगवओ, जर-मरण-किलेस-दोसरहियस्स / वंदामि विणयपणओ, सोक्खुप्पाए सया पाए / // सूरियपणती समत्ता // 10 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org