________________ इन उपांगद्वय की संकलन शैली के अनुसार अन्य मान्यताओं के बाद स्वमान्यता का सूत्र रहा होगा, जो विषम काल के प्रभाव से विच्छिन्न हो गया है-ऐसा अनुमान है। सामान्य मनीषियों ने इस नक्षत्रभोजनविधान को और नक्षत्रगणनाक्रम को स्वसम्मत मानने की बहुत बड़ी असावधानी की है। इसी एक सूत्र के कारण उपांगद्वय के सम्बन्ध में अनेक चमत्कार की बातें कहकर भ्रान्तियाँ फैलाई गई हैं। इन भ्रान्तियों के निराकरण के लिए प्राज तक किसी भी बहश्रत ने अपने उत्तरदायित्व को समझकर समाधान करने का प्रयत्न नहीं किया है। इसका परिणाम यह हा कि इन उपांगों का स्वाध्याय होना भी बन्द हो गया।' चन्द्र-सूर्यप्रज्ञप्ति और अन्य ज्योतिषग्रन्थों का तुलनात्मक चिन्तन दशम प्राभृत के अष्टम प्राभृत-प्राभृत में नक्षत्र संस्थान नवम प्राभूत-प्राभृत में नक्षत्र, तारा संख्या नक्षत्रस्वामी-देवता चन्द्र-सूर्य प्रज्ञप्ति में दशम प्राभूत के बारहवें प्राभूत-प्राभूत के सूत्र 46 में नक्षत्र देवताओं के नाम है / मुहूर्त चिन्तामणि के नक्षत्र प्रकरण में नक्षत्र देवताओं के नाम हैं। इन दोनों के नक्षत्र देवता निरूपण में सर्वथा साम्य है। केवल नक्षत्र गणना क्रम का अन्तर है। इसी प्रकार दशम प्राभूत के तेरहवें प्राभृत-प्राभृत में तीस मुहूतों के नाम, चौदहवें प्राभत-प्राभत में पन्द्रह दिनों के और रात्रियों के नाम, पन्द्रहवें प्राभृत-प्राभृत में दिवस तिथियों और रात्रि तिथियों के नाम, सोलहवें प्राभत-प्राभत में नक्षत्र गोत्रों के नाम, सत्तरहवें प्राभूत-प्राभूत में नक्षत्र भोजनों के विधान / बृहद् दैवज्ञरंजनम्, मुहूर्तमार्तण्ड आदि ग्रन्थों में ऊपर अंकित सभी विषय उपलब्ध हैं। आनन्दानुभूति श्रुतसेवा के इस महायज्ञ में श्री विनयमुनिजी आदि के सविनय सविवेक विविध सहयोगों से अधिक प्रानन्दानुभव कर रहा हूँ और सभी सहयोगियों की संयमसाधना सफल हो यह कामना कर रहा हूँ। आत्मशोधन-सूर्यप्रज्ञप्ति के सम्पादन में जहाँ कहीं प्रमादवश कुछ भी विपरीत या असंगत हुआ हो तो आगमज्ञ बहुश्रुत सुधार कर स्वाध्याय करें और आगामी प्रकाशन के लिए उपयोगी सुझाव प्रेषित करें। सहकार साभार स्वीकार सूर्यप्रज्ञप्ति के कतिपय सूत्रों से सम्बन्धित गणित विभाग का संक्षिप्त विवेचन खम्भात सम्प्रदाय के प्राचार्यप्रवर श्री कान्तिऋषिजी म. सा. के प्रशिष्य स्व. श्री महेन्द्रऋषिजी न्याय-साहित्य-व्याकरणाचार्य ने लिखकर हार्दिक सहयोग किया है। [20] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org