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________________ स्व. पूज्य श्री घासीलालजी म. ने इस भोजन सूत्र को प्रक्षिप्त सिद्ध किया है और कतिपय मांसनिष्पन्न भोजनों को वनस्पति निष्पन्न भोजन भी सिद्ध किया है। ये दोनों परस्पर विरोधी कार्य हैं / - नक्षत्रभोजन का यह सूत्र यदि प्रक्षिप्त है तो मांसनिष्पन्न भोजनों को वनस्पत्यादि निष्पन्न भोजन सिद्ध करने से लाभ ही क्या है ? क्योंकि सूर्यप्रज्ञप्ति के प्ररूपक लौकिक कार्यों की सिद्धि के लिए सावध विधि का प्ररूपण ही नहीं कर सकते और सूत्रागमों का गुथन करने वाले गणधर ऐसे भ्रामक शब्दों का प्रयोग भी नहीं करते, यह निश्चित है / इसलिए हमारे बहुश्रुतों को इस सूत्र के सम्बन्ध में सर्वसम्मत निर्णय घोषित करना ही चाहिए। जैनागमों में नक्षत्र गणना का क्रम अभिजित से प्रारम्भ होकर उत्तराषाढा पर्यन्त का है। प्रस्तुत प्राभत के इस सूत्र में नक्षत्रों का क्रम कृत्तिका से प्रारम्भ होकर भरणी पर्यन्त का है / उपलब्ध अनेक ज्योतिष ग्रन्थों में भी यह नक्षण गणना का क्रम विद्यमान है—अत: यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत नक्षत्रभोजनविधान का क्रम अन्य किसी ज्योतिष ग्रन्थ से उद्धत है।' 1. चन्द्र-सूर्य-प्रज्ञप्ति के संकलनकर्ता श्रतधर स्थविर ने नक्षत्र गणना क्रम को पांच विभिन्न मान्यतानों का निरूपण करके स्वमान्यता का प्ररूपण किया है। पांच अन्य मान्यतानों का निरूपण--- अट्ठाईस नक्षत्रों का गणना क्रम१-कृत्तिका नक्षत्र से भरणी नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र २--मघा नक्षत्र से अश्लेषा नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र ३---धनिष्ठा नक्षत्र से श्रवण नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र ४--अश्विनी नक्षत्र से रेवती नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र ५-भरणी नक्षत्र से अश्विनी नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र स्वमान्यता का प्ररूपणअभिजित नक्षत्र से उत्तराषाढा नक्षत्र पर्यन्त 28 नक्षत्र --चन्द्र-सूर्य-प्रज्ञप्ति, दशम प्राभूत, प्रथम प्राभूत-प्राभूत, सूत्रांक 32 नक्षत्र गणना के इस क्रम के विधान से यह स्पष्ट है कि दशम प्राभत व सप्तदशम प्राभत-प्राभूत में निरूपित नक्षत्रभोजनविधान सूर्यप्रज्ञप्ति के संकलनकर्ता की स्वमान्यता का नहीं है। आश्चर्य यह है कि अब तक सम्पादित एवं प्रकाशित चन्द्र-सूर्य प्रज्ञप्तियों के अनुवादकों आदि ने इस सम्बन्ध में स्पष्टीकरण लिखकर व्यापक भ्रान्ति के निराकरण के लिए सत्साहस नहीं किया। 2. कुल्माषांस्तिलताडुलानपि तथा माषांश्च गव्यं दधि / त्वाज्यं दुग्धमथैणमांसमपरं तस्यैव रक्तं तथा / तदत्पायसमेव चापपललं मार्ग च शाशं तथा / षाष्टिवयं च प्रियग्वपूपमथवा चित्राण्डजान सत्फलम् // कौम सारिकगोधिकं च पललं शाल्यं हविष्यं हया। बृक्षे स्यान्कृसरानमुदमपिना पिष्टं यवानां तथा // मत्स्यान्नं खलु चिनितान्नमथवा दध्यन्नमेवं क्रमात् / भक्ष्याऽभक्ष्यमिदं विचार्य मतिमान भक्षेत्तथाऽऽलोकयेत् // [19] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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