________________ 102 31 25 प्रतिपत्तियां 20 0 2 प्रतिपत्तियाँ 20 0 96 प्रतिपत्तियां 2 प्रतिपत्तियाँ 2 प्रतिपत्तियां बहुश्रुतों का कर्तव्य उपांगद्वय में उद्धृत प्रतिपत्तियों के स्थल निर्देश करना, प्रमाणभूत ग्रन्थ से प्रतिपत्ति की मूल वाक्यावली देकर अन्य मान्यता का निरसन करना और स्वमान्यताओं का युक्तिसंगत प्रतिपादन करना इत्यादि आधुनिक पद्धति की सम्पादन प्रक्रिया से सम्पन्न करके उपांगद्वय को प्रस्तुत करना। अथवा-किसी शोधसंस्थान के माध्यम से चन्द्र-सूर्यप्रज्ञप्ति पर विस्तृत शोधनिबन्ध लिखवाना। किसी योग्य श्रमण-श्रमणी या विद्वान को शोधनिबन्ध लिखने के लिए उत्साहित करना / शोधनिबन्ध-लेखन के लिए आवश्यक ग्रन्थादि की व्यवस्था करना / शोधनिबन्ध लेखक का सम्मान करना / ये सब श्रुतसेवा के महान कार्य हैं। एक व्यापक भ्रान्ति ____दोनों उपांगों के दसवें प्राभूत के सतरहब प्राभूत-प्राभृत में प्रत्येक नक्षत्र का पृथक्-पृथक् भोजनविधान है / इनमें मांसभोजन के विधान भी हैं। इन्हें देखकर सामान्य स्वाध्यायी के मन में एक आशंका उत्पन्न होती है। ये दोनों उपांग आगम है- इनमें ये मांसभोजन के विधान कैसे हैं ? यह आशंका अज्ञात काल से चली आ रही है। सूर्यप्रज्ञप्ति के वृत्तिकार मलयगिरि ने भी इन मांसभोजनविधानों के सम्बन्ध में किसी प्रकार का ऊहापोह या स्पष्टीकरण नहीं किया है। एक कृत्तिका नक्षत्र के भोजनविधान की व्याख्या करके शेष नक्षत्रों के भोजन कृत्तिका के समान समझने की सूचना दी है। शेष नक्षत्रों के भोजनविधानों की व्याख्याएँ न करने के सम्बन्ध में यह कल्पना है कि-मांसवाची शब्दों की व्याख्या क्या की जाय ? अथवा मांसवाची भोजनों को वनस्पतिवाची सिद्ध करने की कल्पना करना उन्हें उचित नहीं लगा होगा? या उस समय ऐसी कोई परम्परागत धारणा न रही होगी ? 1. (क) इन प्रतिपत्तियों के पूर्व के प्रश्नसूत्र विच्छिन्न हैं। (ख) इन प्रतिपत्तियों के बाद स्वमत-प्रतिपादक सूत्रांश भी विच्छिन्न हैं / उपांगद्वय के संकलनकर्ता ने प्रतिपत्तियों के जितने उद्धरण दिये हैं, उनके प्रमाणभूत मूल प्रन्यों के नाम, ग्रन्थकारों के नाम, अध्याय, श्लोक, सूत्रांक प्रादि नहीं दिये हैं। [ 18 ] For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org